दुनियां लुटी है आज उसकी , आई सी यू पार्ट- 1

सुना था, देखा नहीं था

निकलता है, खून भी 

लाल.. ही, रक्तिम 

प्रिये!  

नाक से.. भी, बिखर.. कर! 

बिस्तरों पर.. फैल जाता 

चेहरे के नीचे.. अनकहे..

यह.. 

लाल!  रक्तिम!  

गुलाब की उन पंखुड़ी सा 

पास उनके, जो पाल कर.. बैठे रहे 

ट्यूबर.. कुलॉसिस गलतियों से छुपाकर।

पर.. 

एक दिन, 

पर्दा उठाकर बीच सबके,

खिल.. उठा है पुष्प यह..

और, क्या.. कहूं! 

कोई.. नहीं है, साथ.. अब,

सब... दूर हैं,

छूत है 

बीमारी ही यह, 

इसलिए, मजबूर... हैं

क्या करें, यह.. जिंदगी, प्यारी बहुत है

सबकी, निजी.. है! 

इसलिए वह 

अकेले ही पड़ा है, सो रहा है मेरे पीछे।

जिन्दगी जश्न में डूबी हुई है

थोड़ी और पीछे

उठाकर जब देखता हूँ कालपट 

इस व्यक्ति का

चकित हूँ, 

यह चहेता है मां का अपने।

यह चहेता है मां का अपने।

सिसकते मुझे दीखते हैं

बच्चे इसके, 

रो रही है दूर से आवाज

कोई.. 

दुनियां लुटी है आज उसकी।

जय प्रकाश मिश्र


Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!