पकड़े हुए, वह हाथ.. 
अपने हाथ से, जिम्मेदारी भरे
उस.. भाव से, जल्दी चले
वह बालिका पुत्री उसी की
अलस-लसती 
देखती चहुंओर थोड़ा अचकची सी
हाथों में अपने, रास्ता दूर का
देखते, दिखाते हुए, देखा! मैने..
और निगाह कैसी कातर! 
सपने दूर के 
झिलमिलाते झलकते, उनमें
झर झर उड़ते हुए,
पल पल खिलते हुए, 
संजीदगी की हद
तक सकुचाती, 
शेरनी हो, बीच बिलावों के
उनमें
दृष्टि 
घर बना कर फंस गए हम
अब उसी में कैद हैं
राजी खुशी
इस जीत को मैं क्या कहूं 
बंद हूं खुद, दीवार में 
और 
तमन्ना तेरी मेरी हे विराट सुन तो

चीजें इकठ्ठा हमने की है
इसी घर के नाम पर, सुरक्षा में उन्हीं की
शेष अब यह जिंदगी है।।
घर बना कर फंस गए हम।
आदमी थे मुक्त सारे 
किन बंधनों में बंध गए,
घर बना कर फंस गए।
वह जीतता था, बढ़ रहा था छोड़ता था
क्या करे किसमें रखे, कितना रखे
पर जीतना और आगे बढ़ना
शगल था हर रोज का
लड़ रहा था, इकट्ठा वह कर रहा था
शेष बाकी जिंदगी के ही लिए
सभी कुछ वैसा ही था
एक नाम था, 
वह आया इधर था, लोग जिएं जिंदगी
की याद उसको ही करें।
बढ़ता गया, एक दिन वह थक गया
पीछे मुड़ा लोग तो आराम से थे जी रहे
वह अपनों से अब लड़ रहा था
क्या करे।
और देखा बाद में, 
अब कुछ नहीं था जीतने को
वह लड़ रहा था शेष अपनी जिंदगी से
कुछ नहीं था, सभी कुछ था पास उसके
मात्र कहने के लिए
सब हाथ बांधे खड़े थे, वो रो रहा था
उसे वो वापस बुला ले


चेतना अनुभूतियां 
रेंगती भीतर कहीं
अपने ही अंदर झांकती, 
उन खिड़कियों से
जो बनी हैं, सेंस सी
बाहर सभी में एक सी
एकत्र करती.. अपने भीतर
सतत शाश्वत आत्मा की आत्मता में
रात दिन, साल से शताब्दियों तक।
चैतन्य अभौतिक चिरंतन अस्तित्व आत्मा


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