पढ़ा.. था, कभी.. 'बुद्ध' को....

श्री गणेश चतुर्थी की सभी मित्रों को बधाई! 

पढ़ा.. था, कभी.. 'बुद्ध' को
'संसार.. दुःख है', 
पर..
देखता.. हूँ! 
खिलता.. हुआ, यह
सुंदर.. सरोरूह., इंदीवरम... 
अनुपम..म! 
गुलाबी..!  यह, 
दीखता.. है! हर सुबह! 
उगते.. हुए, उस अरुण.. के संग
किलोल.. कर कर! 
बिकसता.. है, 
खोलता.. 'उर... ग्रंथि' 
निज.. 
आनंद भर भर, सहज.. अंदर..
रसाता... है, लुटाता.. है, 
पराग.. कण।
सब 
भूल कर, 
बेसुध हुआ, प्रिय! 
मगन होकर...खेलता है...,
उष्णता.. ले, ऊर्जा.. ले, 
जवां.. होते, चढ़ रहे 
मार्तंड की
यह, 
देख न! 
चिक्कन, मुलायम, सहज कोमल! 
स्निग्ध कैसा, मोहता मुझे.. 
दूर से, आबद्ध करता, 
खींचता.. है, 
पास.. 
अपने, लावण्य से, रूप से!  
प्रिय! 
रंग.. ले, ले, मनोहर! 
भेजकर, 
सौरभ निमंत्रण! 
मौन ही यह, मुस्कुराकर
बांधता है, रज्जुओं से स्नेह की,
प्यार में मुझे पाशता * है। 
हिल.. रहा है, 
पवन 
के संग.. 
मुझको लगा, 
स्वीकृति.. यह दे... रहा मुझे 
मुक्तता से, प्रसन्न होकर 
कुछ इस तरह, 
मैं... 
बंध गया हूँ, सौंदर्य से, 
निखार से, 
इस रूप के संजाल में 
मैं, फंस गया हूं।

पढ़ा.. था, कभी.. 'बुद्ध' को
संसार.. दुःख है, 
अब सज़ गई है, सेज मेरी
दुखों की, प्रिय! 
इसके ही
संग।
मेरे लिए भी, 
साथ इस... खिलते.. हुए, 
सुंदर.. सरोरूह... 
इंदीवरम.., अनुपमम..! 
प्रिय!  देखकर, इस रूप को..
अभिलाष... 
कैसी जग.. गई है।
दुख... 
टपकता है, यहीं.. से 
प्रिय! 
रिस.. रहा है, अंतरों में, 
बस पा.. सकूं!  
इसे छू.. सकूं! 
पास अपने रख.. सकूं! 
विकल.. हूं! 
मैं जानता हूँ, तत्वतः प्रिय!  
सच.. है क्या! 
यह लुभाता, मुझे कष्ट देता
सुंदर सरोरूह! 
कुछ नहीं, प्रिय! कुछ भी नहीं! 
संयोग है, 
मैं इसके संग, यह मेरे संग।
इससे.. ज्यादा कुछ नहीं,
प्रीति... मेरी, 
क्षणिक है, 
रूप से ही बंधी है
रूप खुद तो, बदलता है निरंतर!  
स्थिर नहीं है, एक पल..
इसलिए मैं कह रहा, संसार विभ्रम! 
प्रिय मेरी! संसार है भ्रम! 

लाल है आकाश अब! 
दिन ढल गया है
स्याह हैं सारी दिशाएं
शाम!  प्रिय, होने.. को है!
डूब... जाएगा, ये सूरज 
क्षितिज के उस सम्मिलन में..
भ्रम है जो..
उम्र के इस पड़ाव में, इस आत्मा के 
क्या कहूँ !
नीलिमा लिए रंग गहरा उतर आया
उस गुलाबी इंदीवरम ऊपर
मुरझा रहा है, 
शिथिल हैं अब, सारे अंग..
दुख! सत्य है, 
संसार... में, प्रिय देख कैसे
कारण, के कारण... 
आ धमकता है द्वार मेरे
बिना पूछे किसलिए यह! 
इसलिए यह, इसलिए यह।

जय प्रकाश मिश्र



Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!