दूर थी मंजिल हमेशा
जानता हूं,
कठिन.. थी, दूर.. थी विश्वास से यह
मानता हूं!
आज भी है, उस समय, सच! और भी थी
आज है ऐसा, अरे यह सच नहीं है!
खुद लड़ा हूँ, जंग.. यह
इसलिए तो कह रहा हूँ,
बेसब्र.. हम हैं, व्यवस्था.. से
जाने... न, कबसे..,
व्यवस्था.. यह, कुछ भी कर.. दे
सीमाएं हमारी हमी तक हैं
संतुष्टि अपनी हमीं तक है।
क्या करें...
जिस समय तक व्यवस्था यह
मेरी मंजिल
मुझको न दे, दे।
कुछ.. तो होगा.
खड़े हैं ऊपर.. वहां उन्हें देखता हूं
उलट ही सब सोचते हैं,
गलत है क्या?
मेरी समझ से..बेकार की बातें है सब..
मुट्ठियों में, भाग्य किसके बंद है,
वह कह रहे हैं
मुट्ठियों में भाग्य उसका बंद है..
यह सोचना, सच गलत है
मिट्टियों में पला था वह
अनुभवों में कढ़ा वह
निर्भीक है, स्पष्ट है, हर सोच से
यही तो गहना सदा पहना है वह..।
जो दीखता है, चमकता..
खींचता.. हर एक का मन।
बस, इसी का अंतर है सब।
आवाज यह,
एक भी..
अनिश्चयों, विभ्रमों, सांसारिक युद्ध सी
परिस्थिति के दृष्टिगत,
चलते हुए, खींचते
इस जिंदगी
को, कंधों पे इन
उन समय की
Comments
Post a Comment