पात, सारे... झरेंगे ही, एक दिन..,
मित्रों, देखा है सच! इन आंखों से, इसलिए ही लिख रहा हूं, एक समय आता है जब सेवा करने वाले अंत घड़ी में वृद्ध के प्रति ऊब जाते हैं, उतावले भी और काम धंधों के नुकसान फायदे की बात करते हैं इसी पर चार लाइने आपके लिए...।
पात, सारे... झरेंगे ही,
एक दिन..,
सब.. जानते हैं
बस, जब तलक हैं शाख पर..
ताजे, हरे, खुशतर रहें,
मुस्कुराएं.., हंसे..
थोड़ा...,
ध्यान.. रखें, बुजुर्गों... का
इससे ज्यादा
और क्या
हमे.. चाहिए अब!
उम्र.. के, इस फेज में।
पलक.. भर की बात है,
थोड़ा.. रुको!
गिरने... तो दो, इन पत्तियों को,
सूख कर!
लाचार हैं, ये! देख.. तो,
नाम..भर! को टंगी हैं,
इन.. डालियों पर,
लुंज.. हैं, बेकार.. हैं,
बस स्नेह है, थोड़ा.. कहीं
चिपकी.. हुई हैं,
सच कहूं तो,
प्रिये ये!
अस्तित्व से ..., निज.. लड़ रही हैं।
एक झोंका..., हवा.. का
बहने.. तो दो।
चू पड़ेंगी, लटकी हुई, ये पत्तियां,
फिर...
चले.. जाना,
कौन.. रोकेगा तुम्हे!
बोल सकती.. देहरी, दीवट नहीं हैं।
कौन है?
मुझे.. लांघता?
पूछती.., पहचानती..
चौखट थी... ये! अब.. देख न!
दूर... घर.. से हो गई है।
कैसी.. बूढ़ी हो गई है।
पहचानती... है,
फिर भी.. मुझको,
चीन्हती.. है,
कैसे... हो, बाबू..! मौन ही
यह पूछती है।
क्या बताऊं हाल इसको!
बच्चा था, मैं...,
सामने इसके अभी..., एक..मचलता...
अठखेलियां प्रिय खेलता,
पत्तियां... सूखी हुई मैं हो गया हूँ,
देर है, आहट लगी है,
देर सबको हो रही है..
चू ये जाएं, काम पर! प्रिय सभी जाएं
इस लिए तो कह रहा हूँ
पात, सारे... झरेंगे ही,
एक दिन..,
देर बस कुछ घड़ी की है।
देर बस कुछ घड़ी की है।
जय प्रकाश मिश्र
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