छू गई थी, छन्न.. से वो.., एक क्षण को!

सोचता हूँ, रोज.. मैं...
रोज़* को इस, छोड़कर...
क्यों.. लिखूं!  
इस...,  दर्द... को! 
टीसता.. है,   पेनफुल.. 
अच्छा नहीं है, जानता हूँ!  
मानता हूँ! 
पर, क्या... करूं!  
कर... लिया,   सब..,  
मित्र.. मेरे! 
साथ ही..., यह... छोड़ता, 
एक क्षण को, तनिक भर भी...
रात दिन..., 
बिल्कुल.. नहीं है।

सगा.. सा, 
ये.. हो गया.. है, 
जुड़ गया है, जिंदगी में.. 
समस कर..
प्रिय...! 
विंध् भिन.. गया है, 
अंतरों... में! 
प्रिय.... मेरे यह! 

रेशमी... 
रेशे से, पतला.., 
उड़ता... हुआ..!  
आवाज.. बन कर, पर* लगा कर! 
निकलता यह! 
मुंह.. से मेरे, आह!  बनकर...
पुकार बन!  यह.. 
पुकारता है, आज भी..., 
मां.. बाप.. को, 
सच..!  
चीखता... है, 
आर्त.. होकर!  किस.. लिए
जानता.. है, प्रिये.. यह..., 
वो... यहां, 
अब.. नहीं हैं, इस धरा पर..।

पर क्या कहूं! 
सोचता.. हूँ, 
क्या मूर्ख हूँ मैं / चालाक हूँ, 
बालक.. से बदतर! 
शून्य... हूँ, मैं.. 
कौन हूँ! 
क्या.. धुंध हूँ, मैं.., दर्द की चादर बुनी एक्।

शमशीर... हो 
कोइ, बहुत.. ठंडी 
बर्फ.. की, 
माइनस सिक्सटीन से कम...
स्पर्श... कर, 
मेरे.. हृदय.. को
छू.. गई हो, छन्न.... से..
बस.. एक, क्षण... को
आह...! 
उसकी.. वितृष्णा!  
को.. क्या कहूं! 

प्यास देकर.., मारती.. है
किस. तरह...
दर्द!  है ये, पास मेरे, 
इतना  निकट! 
नाराज़ हूँ, खुश भी हूँ! 
और तुमसे क्या कहूं, प्रिय.. विभ्रमित हूँ! 

एक सच सुनो! 
तुमसे भी 
प्यारा.... 
दर्द.. यह मेरी, जान! 
अब, जान.. से, प्रिय जुड़ गया है,
एक होकर, 
तुमसे भी बेहतर...।
मुझमें... ही यह.., मिल.. गया है
समंदर... बन! 
समंदर बन, 
मैं इसी में डूबता हूँ, जागरण भर।

जय प्रकाश मिश्र
शब्दार्थ: 
रोज़* सुंदर पिंक गुलाब
पर * सुंदर पंख

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