राधा मन, हेरि.. परी रे!
राधे... मन, हेरि... परी,
हरि... दीखत कहूं, नाहिं
बांसुरि धुनि तो सुनि परै
राधे! मन, चंचल.. बहुत
चित.. में, धरा.. न जाय,
बाज़ै… झाल मृदंग जब..
चित.. में, धरा.. न जाय,
बाज़ै… झाल मृदंग जब..
तब.. लै…, मन.. हर्षाय..।
दिव्य! बाद, बाजन.. लगे
हरषि.. पड़ी, चहुं.. ओर..
मधु-अमृत, जन सब.. पिये..
चित.. लइ.. गए, चितचोर..।
दिव्य! बाद, बाजन.. लगे
हरषि.. पड़ी, चहुं.. ओर..
मधु-अमृत, जन सब.. पिये..
चित.. लइ.. गए, चितचोर..।
देह.. दशा, विस्मृत… भई
ताली… पीटत, लोग!
आंख खुली की, खुली.. हैं
फिरि… आए, प्रभु… लोक।
कृष्ण… वहीं, बैठे.. रहे,
तन मन की.. सुधि खोय
घड़ी कहै.. घड़ियाल सो,
केहि विधि.. मिलना होय।
राधा.. हेरति, श्याम.. को
इत.. उत.. सारी ओर..
देर…भई, दीखे.. नहीं,
कहां गये.. चित-चोर...।
चैन नहीं, राधा परै
देर भई.. अति.. आज
श्याम कहूं नहि दीखते
काजल.. मुख बहि.. जात।
प्रेम विकल जब हुई गईं
श्याम..., मिलाए राह..
रमण-रेति पर, कस खड़ी
आंसू नैनन.. बहि जाय।
दूरिहि.. देखि,
मगन.. भईँ,
माधव मन मठुरांय ,
मूर्ति… होइ कोई पाथरी..
मूर्ति… होइ कोई पाथरी..
राधा खड़ी वही थाँव।
प्रेम, डोरि.. माधव बंधे,
मणिधर…मणि की थांव बंचक..।
धावति.. नदी
हो,
नीचे… गिरती…
तत्क्षण, जिमि, जमि जाय,
जम गईं, बरफ़ भईं, तस मानो,
रुकि गईं, जैसे..थीं, वैसे।
श्याम.. देखि ललचांय।
आईं… दौड़ी धाय..
श्याम निहारत नैन सो
गोविंद रहे लुकाइ
भोर पड़े, भोरे हुए
धावति.. नदी
हो,
नीचे… गिरती…
तत्क्षण, जिमि, जमि जाय,
जम गईं, बरफ़ भईं, तस मानो,
रुकि गईं, जैसे..थीं, वैसे।
श्याम.. देखि ललचांय।
आईं… दौड़ी धाय..
श्याम निहारत नैन सो
गोविंद रहे लुकाइ
भोर पड़े, भोरे हुए
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