मां का वह झीना सा आंचल...

मित्रों, मां का आंचल निश्चित ही एक अनुपमेय सुरक्षा, सुख, निश्चिंतता का स्थान, वरदान, आपद मुक्ति और क्या कहूं। इसी पर चार लाइने आपके लिए..

इन.. 
मिट्टियों.. की, 
सोंधी*.. महक को क्या कहूं!  
प्रिय! 
मलिन... होतीं, ही... नहीं हैं, 
स्मृति... से।
खींच लेतीं हैं मुझे..ये
अपने भीतर, 
धुंधलते आंचल में, मां के।

आज भी, 
ये... बालपन में 
बचपने..में, घेरकर! मुझे
रोकती हैं, 
कह रहीं हैं प्रेम से,
आ चलें... पीछे! 
प्रिये..! 
फिर, उन्हीं हम! मस्तियों में। 

माई*.. का 
आंचल*..! याद है,
वो... गंध.. उसकी याद है, 
पंजी*.. की साड़ी, 
किनारी*.. 
कोर.. जिसकी चमचमाती, 
छपेली*.., 
वह.. पहनती
तीज या त्यौहार में..,
छुपाती, मुझे उसी.. में, 
किस.. प्यार से...
सुखबेलि*.. मेरी! मां थी वो.! 
मुझे याद है,
झीना* वो आंचल, सुखद आंचल,
मुक्ति था संसार से।

छुप, 
लुकाना*, 
दौड़ कर!  प्रिय, सच...! 
उसी. में, दूर होना भयों.. से, 
हर आपदा से
कष्ट.. से, 
हर 
दुखों.. से, मार्ग.. था, 
आसान.. था, किस तरह 
वह! 
सोचता हूं! आजतक।

मैं बच.. गया, विश्वास.. था,
दुनियां... हिले, 
मर.. मिटे, 
मैं उसी में आबाद... था,
वह आंचल नहीं था, 
मेरा 'एस- ४००'
सच.. कहूं! मेरे पास था।

कुछ भी करूं! 
मैं... तोड़ दूं! फोड़ दूं, गिरा दूं, 
पीट दूं, सिर फोड़ दूं, किसी विरोधी का..
आंख.. उसकी कोंच*.. दूं!  
नोच.. दूं मैं, मुंह किसी.. का
बस.. भाग कर, 
प्रिय! 
आ... छुपूं 
आंचल मे उस! गंदले.., 
मैं...., 
सुरक्षित... था, 
चिंता नहीं फिर, बाल... भर! 
पक्ष.. मेरा, 
कमजोर.. हो, 
सत्य मुझसे दूर.. हो
चिंता... नहीं, मां मेरी, सब.. देख... लेगी
मैं... प्रिये! निश्चिंत था। 

इन.. 
मिट्टियों.. की, 
सोंधी.. महक का क्या करूं!  
मलिन होतीं ही... नहीं हैं, 
स्मृति... से।
खींच लेतीं हैं मुझे..ये
अपने भीतर, 
धुंधलते आंचल में, मां के।

जय प्रकाश मिश्र

शब्दार्थ 
सोंधी*.. मिट्टी की विशेष खुशबू
माई*.. गांव में मां का संबोधन
आंचल*.. साड़ी का सिर पर रखने वाला ब्लेस्ड भाग। 
पंजी * पांच गज लंबी, एक रंगी साड़ी 
छपेली * डिजाइनदार फूल छपी साड़ी 
सुखबेलि*. सुख का आधार, आश्रय
झीना* तार तार झड़ा हुआ पुराना कपड़ा
लुकाना* चुपके से छिपना
कोंच दूं* चोट लगा दूं।

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