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Showing posts from November, 2024

यारों! यही तो, वह जिंदगी है..

पक्ष एक: भावात्मक जीवन एक फूल.. बोला..  मुस्कुरा कर...  कनखियों से.. पास.. एक् बैठी... चिड़ी से... हम... एक ही हैं, देख तो, तुममें चहक... है,  मुझमें... महक है, आ.. छू मुझे... कोमल परों... से। अरे तूं मान मेरी!  यही तो...,   है.... जिंदगी । फूल.. बोला  सोचता हूं, सिहर जाऊं...  कोमल सजीले.. पंख तेरे आज, छूकर.. सानिध्य तेरा पूर्ण लेकर... दिल कर रहा है... बिखर जाऊं। पांव तेरे, खुशबू थोड़ी.. अपने हृदय... की प्यार से मै, खुद लगाऊं। आ मिलें...  हम एक क्षण... को,  पास इतने..आज आपा भूल जाऊं!  पक्ष दो: यथार्थ  माली खड़ा था,  कट कर रहा था, आज पौधे एक सीध में सब डालियां, भी कर रहा था बाहर खिला था पुष्प हल्का!  बहुत थोड़ा!  हाय सारी! देखते ही देखते  ये क्या हुआ?  कट गई डाली वही...  प्रश्नगत यह पुष्प! जिसमे था खिला। उड़ गई वह चिड़ी...  छूते.. फूल को...स्पर्श देती आखिरी गिरने से पहले, पुष्प के, उस भूमि पर!  ले गई... सौरभ महकता... दूर वो पांव... उसके महकते हैं आज भी  उस महक से..। सोचता है चिड़ी वह!...

मां है वो! मां है सभी की।

मां की महत्ता पर एक संक्षिप्त कविता पढ़ें और मां की गरिमा को जाने वह जीवनदायिनी है। मां ने कहा था कभी जब असहाय और हर ओर से हार जाना तो मेरी  गोद में हो मानना, बस ये सोचकर आंखे बंद कर.. आगे बढ़...ना। एक तंतु था  किसी देह का… पर वो  बंधा, उर... से मेरे था;   कुछ इस... तरह!.. कैसे कहूं!  इस उम्र भर...  हर एक क्षण  अपनत्व की सीमा ही बनकर। मैं….  जहां.. था अलग न… था, कभी... उससे। जब तलक जिंदा रही वो एक क्षण भी..  एक पल को… दूर मुझसे। एक् सच कहूं!   आज तक.. उसकी नजर से.. दूर मैं कितना भी था..  पर दूर न था... एक पल  उसके... हृदय से। हर... वक्त!  क्या कहते हो तुम?  ये वक्त.. क्या है?  आंधियों तूफान में भी... वो नहीं.. कभी रख सकी.. है दूर.. मुझको, इस वृद्धता की उम्र में भी धुक धुक धड़कती,  धीमे चलती, धड़कनों से..। वो.. मां है, मेरी..!  मैं... टुकड़ा हूं! उसका, आखिर मैं! अभी जो कुछ यहां हूं  पूरा हूँ उसी का!  कौन होगा और ऐसा!  मैं जुडुंगा जिसके तन से, और ऐसा, इस तरह से। मैं अंश हूं, ...

रूप कैसा निर्झरा, अजरा सजा है

पग प्रथम:  क्या है? वह!  जो.. मधुर… है,  इस संपदा में, संतति,  यश कीर्ति में!  सुख, स्वाद है, आनंद है!  क्या मधुकरी में!  शीतल, सुगढ़, सौंदर्य है!  शाश्वत भी है क्या?  क्या शांति है? वह जो तिर रहा है  हर कोई  उस  छांव में,  पास उसके  जा रहा है.. तरी… लेकर.. विकल होता रातदिन!  क्या है? वह!  जो.. मधुर… है,  इस संपदा में, संतति,  यश कीर्ति में । भाव: संसार में हर कोई सुख, खुशी, और आनंद के लिए स्वार्थी हुआ जा रहा है। सोचने का विषय है कि क्या ये प्राप्तियां क्षणभंगुर, नाशवान और भयकारी नहीं हैं फिर हर कोई अपने जिंदगी की तरी अर्थात नाव लेकर इन्हीं में क्यों समा रहा है जबकि इनमें वास्तविक आनंद, दीर्घ कालिक आनंद, स्थाई आनन्द है ही नहीं। क्या वह आनंद मन बुद्धि की प्रशांति, और स्थिरता में है या धन, संपद या संतति और यश कीर्ति की अभिलाषा में है सोचना चाहिए। पग दो:  जो कुछ  यहां  तुम देखते हो,  सुख सरीखा छाया है यह,  उस… मूल.. की,  क्षणिक केवल.., अंश.. है पागल हुआ है.. विश्व सारा...

वो झुक गई थी फूल से मैने कहा ना शर्म से

पग प्रथम:  इक जिंदगी उस पार... थी,  इक जिंदगी इस पार भी है, बीच का ये रास्ता  संकरा बहुत है, है कोई साथी मेरा क्या,  ढूंढता हूं.. एक घर बसाए, बीच में  इस  सुरसरी की धार में, साथ मेरे, आज गहरे  तली में, इस गरजती  मज़धार के। भाव: जीवन की नदी दो पाटों के बीच बहती है।एक कर्म क्षेत्र होता है जो भागम भाग भरा आप धापी और प्रतिस्पर्धा लिए और दूसरा संयमन और शांति, का शारीरिक असमर्थता का आप दृष्टा मात्र रह जाते हैं। इनके बीच आपसी संपर्क तो रहता है पर अति संक्षिप्त लेकिन इस समय सच्चे साथी की जरूरत आती है जो सांसारिक बहाव के बीच अपने को स्थिर रखे और असहाय अवस्था में साथ दे। पग द्वितीय:  है कहां वह लहर जिसमे भींग जाऊं ... कंठ तक आकंठ डूबूं... सिहर जाऊं ले चले  जो  साथ अपने  दूर तक  मझधार तक,  छोड़े नहीं  जो साथ, मेरा मध्य में  मैं साथ जिसके  तैरता जग पार पाऊं। जय प्रकाश मिश्र भाव: जीवन के अंतिम प्रहर में अच्छे ही नहीं सच्चे और ईमानदार साथी एवं मित्रों की जरूरत आती है जिनके साथ जीवन रस के साथ हंसी खुशी जीवन बीते और जीव...

गगरिया में.. गेनवां...डुबय...उतराय..।

गगरिया में.. गेनवां...  डुबय...उतराय....। क्षनै भर लौके.., क्षनै भर कूदय... क्षनै भर में बबुआ..  अरे!  जात ई..  लजाय..। गगरिया… में गेनवां...  डुबत… उतरात। भावार्थ: संसार में जीव और प्राणी थोड़े समय के लिए ही आते है और फिर विदा लेते हैं जैसे कोई गेंद पानी के पात्र में डूबती और तैरती है। पर इतने में ही उसका अहंकार उसे यहां नचा डालता है लेकिन ज्ञान होते ही वह आत्मभर्त्सना से लज्जा भी अनुभव करता है।  आवत… गेनवाँ  बड़ा निक… लागल..  आंगन में सोहरा…  मैं, देहलों… गवाय, गगरिया… में गेनवां...  डुबत… उतरात। कुछय दिन में गेंनवां  तोता अस बोलय देखि देखि छतिया... जाय रे जुड़ाय, गगरिया में गेनवां, डुबत उतराय। भावार्थ: इस संसार में जब संपदा या संतान मिलती है हो हम सोहर यानी मंगलगीत के आयोजन करते हैं प्रसन्न होते हैं। और बढ़त बढ़त सम्पद सलिल या जैसे जैसे और चीजे या सुख मिलता है हमे अपने में लपेटता जाता है। पर जीवन में स्थाई कुछ नहीं मिलता और छूटता रहता है। कूदत गेनवां,  मरम... मोहिं, बंधलस उछरत  बछरू अस  थनय..  तर जाय। भोरी भई ...

मैं बावरा ही रह गया..

पद प्रथम:  मै कौन हूं देखता हूं, आप को...  (खुद को) आश्चर्य होता है... बहुत नस नाड़ियों... का जाल  सीमित देख कर, हैरान हूं। माप जिसकी, अंगुलों.. में  फिक्स... है, मैं जानता.. हूं कल्पना के पट.... अमित  इसमें छुपे.... हैं.. देखता हूं। भावार्थ: अपनी खुद की और सामान्य आदमी की लंबाई साढ़े तीन हाथ अंगुलों में नाप सकते है, इतनी छोटी! और उसकी सोच की पींगे! अंतरिक्ष तक। कल्पना क्षेत्र  'आकाश-गंगा' तक। यह सीमित में असीमित का रूप देख कर आश्चर्य होता है। उड़ रहा मन इंद्रियों  का साथ पाकर.. हिल नहीं सकती.. हैं  जो...  अपनी जगह.. से, बाहरी संज्ञान  केवल, काम जिनका आंतरिक यह शून्य है, अपने ही तन से। भावार्थ: यद्यपि आदमी खुद उड़ भी नहीं सकता इसकी सारी मूल रचना शरीर में शरीर तक ही हाथ, पैर आंख, नाक ,कान, मात्र संज्ञान के साधन तक सीमित हैं। सारी इंद्रियां अपनी जगह वास्तुवत हैं अपनी जगह भी छोड़ कहीं जा नहीं सकती, मन भी इसके भीतर ही रहता है पर वाह! आदमी और उसके कारनामे विस्मय की चीज हैं। उड़ रहा आकाश में,  अणुओं के भीतर एक सा वह देखता हूं, सीमित असीमि...

कइ मर्तबा, कई लाइने

क्षणिकाएं: 1 मैं नन्हा  हिलता  डुलता ‘दीपक’ मद्धिम प्रकाश लिए सच्चाई, सबकी  मेरे प्रकाश में अंदर बाहर  हृदय तक की भी दिखे। क्षणिकाएं: 2 मै बांस की  रूखी सूखी बांसुरी!   कट छील कर बनी, मिठास सबके मृदु मधुर रसीले होठों की  मेरे ऊपर खिली। क्षणिकाएं: 3 नेह होगा,  स्नेह को वह खोज लेगा, हर अंधेरे रास्तों पर  साथ देगा.. एक दीपक,  रख चला, मेरे लिए वह.. चांदनी आए,  रहे, या लौट जाए..। प्यार उसका  जल रहा मेरे लिए, मेरे रास्तों पर उम्र भर उजाला लिए। क्षणिकाएं: 4 सुख दुख के संग  उपजी  इसीलिए   शायद उनमें गहराई तक  लिपटी स्नेह की मिट्टी। जो, कभी न  छूटी... लगी रही तनमन के  आंगन  अंदर से अन्तस में  पुती।  दुख सुख से  निकली,  सुबहो शाम   गरीबी की  गर्म चाशनी में लिपटी  इसी लिए   शायद हम सबमें  भीतर तक समसी आपसी  नेह की मिट्टी। क्षणिकाएं: 5 तूझसे न बनी कहते.. न मैं अब..  सुन... ही पाता हूं मेरी नजर तेरे ऊपर चिपकी रही,  हर एक, पल पल सच कहूं अ...

रोक दो नदियां ये सारी, आज ही वापस करो!

द्युति प्रथम: मत भाग पीछे चाहना के.. समुद्र था,  वह पर सोचता.. था,  अनवरत! रात दिन.. आज भी खाली.. है.. कितना!  यही तो वह.. चाह! थी.. भरती... नहीं थी,  उसी को ले जी रहा था.. सागर तो था,  पर तृप्त... न था!  भर गया!  मै भर गया..अब!  कंठ तक, पानी हुआ,  अब!  बस करो!  सांस ले पाऊं, तो मैं,  थोड़ी जगह! खाली करो!  रोक दो नदियां ये सारी,  आज ही वापस करो!  अब!  सोच से..  वह तृ-प्त था,  सं-तुष्ट था, परि-शांत था,  स्थि-र भी था,  और म-स्त था। खारा....!  है पानी...  सारा... मेरा!  इक भाव.. आया, अंतर्मनों से.. वह क्या करे! एक सोच थी!  छूटती ही थी नहीं..,  अब!  वह विकल.. था, संतप्त था,  सूखता था... कंठ उसका..  एक.... सच कहूं.. सब कुछ... वही था,  जिसको लिए वह, पूर्व में ही, तृप्त था। सच, यही है   खेल है! यह विश्व, सारा.. . मान मेरी..!   सच.. कह रहा हूं.. सब सोच है, कौन क्या है,  और  मैं कहां हूं..!  जो पूर्ण है तेरे लिए, ...

आदमी से आदमी ही निकाल लोगे! क्या बचेगा

भाव: दो शब्द उनके लिए जिन्हें लोग आदमी होते हुए भी आदमी नहीं ..... से भी कमतर मानते हैं। उनकी यथार्थ स्थिति, समस्या को जानने की कोशिश कभी नहीं करते पुनश्च दुत्कार देते हैं। ध्यान दें उनमें भी एक आप जैसी ही आत्मा होती है, पर दुर्भाग्य उनका पीछा नहीं छोड़ता या कर्म फल ईश्वर जाने! कुछ भी हो वे मनुष्य तो हैं। उन्हें कुछ मत दो, बात तो अच्छे से करो क्योंकि तुम तो अच्छे मनुष्य हो अपना परिचय ठीक रखो। इसी पर दो शब्द पढ़ें। रोक, दो!  तुम, भावनाएं रोक लो..!  सामने कोई दीन हो..!  मंगता खड़ा हो..!  तो सोच लो..,  एक बार गहरे सोच लो!  मांगे… अगर,  तुम दे सको… तो दे ही…. दो। न दे सको, यदि  अगर तुम!  तो.... मत भी दो। पर शांत. हो! शांत.. हो! शांत... हो!  इस समय.. तुम शांत.. हो, अंदर से अपने.. शांत हो, बस इतना... करो!  गौर.. से  देखो… उसे… उसकी अवस्था.., हाल.. क्या है..?  दशा.. क्या है? ध्यान दो!  सच सामने.. है,  या छुपा.., पीछे कहीं है..  दूर है, या..  रक्त रंजित सामने ही,  वह खड़ा है? पहचान तो। व्यथा… देखो! ...

प्यार की पलकों से छू,

मुस्कुरा..पहले थोड़ा..तूं फिर, नजाकत.. को समझ.. बहुत धीमे.. बहुत हौले.. , प्यार से.. अब, पांव रख..। दिल… है, ये!  दस्तक न देना, जोर से..!  दरवाजा.. नहीं है..  घर का… तेरे! ध्यान रख!  प्यार की पलकों से छू,  सज़दा तो कर!  नालायक.. है क्या?  यह, खुदा.. का, अपना ही घर है..   वजूखाना नहीं.. है  मस्जिदो का!  चला आया यहां,  चाहे जिधर से,  आ समाया, भीड़ में। लगन…लग….  समय को, ताक पर रख!  खड़ा रह, जिंदगी भर!  कम है यह, इसके लिए!  दिल है यह.. पांव मत रख! सिर के बल चल!  पाकीजदगी का अंत है यह..। देर लगती है यहां... ये...  ‘दरवाज़ा-ए-दिल’ है, खुलेगा..., वक्त लेगा रस्क रख देर होगी, पर खुलेगा, एक दिन.. विश्वास रख। खुलता गज़ब है। जब खुलेगा... समा.. जाएगा, सभी.. कुछ  दीखता जो कुछ, अलग है, डूब… जाएगा उसी में.. धैर्य रख सारा जगत यह। बहुत छोटा... इल्म.. तेरे पास है!  कोई नहीं... इससे बड़ा.... है, मान.. मेरी,  संजीदगी से... छू इसे..,  सर माथे पे रख, धूल इसकी,  प्रेम से, दिल है यह। पाकीजा-दगी...

मणिबंध मुक्तक तेरे हैं ये...

तेरे लिए रखें हैं मैने, शब्द कुछ:  सब कुछ.. संजों कर,  रख दिया है..  शब्द में...   जब..  याद आए, देख लेना, पुर-जरूरत, जैसी पड़े,  इक-नजर,  एहसास जब, झीने... लगें गहराइयां... कुछ कम लगें  तुझे... जिंदगी.. में। "जिंदगी  बस आज तक है,  जी.. इसे  इस क्षण अभी"  यही थे, वो शब्द! रखे थे बचा तेरे लिए। भाव: जिंदगी जो हम जी रहे हैं इसको जीने का तरीका महत्वपूर्ण है। कुछ विशिष्ट बाद में नहीं आएगा। हर क्षण बराबर ही महत्व का है प्रतिक्षण का संतोष, और चेतना पूर्ण जीवन ही जीवन का सार है। मुक्तक दो: जो बेघर रहे हैं आज तक।  एक खुली... दूकान  छोड़े... जा रहा हूं,  खास!  उन.. सबके लिए,  जो पुश्त से दर... पुश्त,  बेघर... ही जिए, चमन में, इस आज तक,  भागते... सपने लिए। ताला रहित.. है,  हर तरह,  दीवार भी कोई नहीं.. है  सामान जो चाहे! तुम्हें  तुम खोज.. लेना,  पलटना पन्ने.. मेरे, और ढूंढना  कोई सतर..!  तुम काम की... सीढ़ियां भी यही हैं..  रास्ता और कुंजियां भी.. जो देखते हो ...

भीग जाता हूं, भीतर तक

पग प्रथम:  सच्चाई की झलक चीजे बोलती हैं,  चुप रह कर, ज्यादा जोर.. से जब सुनेंगे..आप थोड़ा ध्यान से। आवाज सच्ची.. होती है एक ही होती है  सबकी, दुनियां भर में..  हर जगह.., हर समय.. अगर आवाज... है तो.. बिना.. सिखाए  एक सी.. निकलती है। खुद-ब-खुद, इन सूर्य किरणों सी। निकालनी नहीं पड़ती, जी हां...  वह खुद ही निकलती है। “वही मात्र” होती है... रोने में,  हंसने में,  खाने में, खोने में,  सोने में खुश होकर ठुमकने में, दुख में... गले की सिसकियों में.. और गले के बीच  कभी कभी कोई चीज  बार बार सी फंसने में। गुनगुनाने में, मुस्कुराने में।  चीत्कार.. में,  करुण.. चितवन में मस्ती में, अलमस्ती में खिलखिलाते संग, किलकिलाने में। भाषाएं नकली हैं, मस्तिष्क में भरती हैं बोलियां... छूती हैं, दिल..,  तन, मन, चितवन.. तुरत जगातीं हैं,  भावनाएं.. करुणा, प्रेम, निजता..  क्योंकि यह सबकी  अलग… है बस इसी लिए नहीं.। इसलिए भी  क्योंकि खा जाती हैं मात्राएं भाषा ओं की  अच्छी, अच्छी, प्रेम में शून्य कर देती हैं;  संबोधन, आवा...

मैं नया.. सूरज बनूंगी!

आज सूरज बंद था,  कमरे में अपने.. सुबह से.. नाराज था, निकला नहीं था.., एक पल.. को न जाने क्या.. हुआ था.. खेल चकरघिन्नी काटते!  इस नियति के  ब्रह्मांड में। कौन जाने! क्या हुआ था। विवश थे सब! चुप खड़े थे!  सबेरा! क्या करे!   गुमसुम खड़ा था, वहीं बाहर,  ऊंघता परवश पड़ा था!  चिड़ियां चहक कर कुछ देर...  सुंदर.. दिन खिलेगा,  आस करतीं जोहती.. राह तकतीं  कुछ देर तक,  चुप हो  शांत थीं। मसकतीं  कलियां नवेली  चटकने  को  घनी  आतुर सौरभ भरे, निज अंक में..  तैयार थीं,    रूप.. का श्रृंगार कर कर, झांकती.. चौखट पे आकर,  लौटतीं..संतप्त थीं। हवा ताकत भरी थी.. पर खड़ी थी!  सोचकर बेहाल थी, कैसे.. बहे,  कब तक.. बहे,  कितना.. बहे, रुख भाँपती.. उन सूर्य.. का  हाथ जोड़े नम्रता से खड़े-खड़.. पदचाप उनका जोहतीं थीं.. कांपती थीं, एक कोने  मोड़ मुंह, नीचे खड़ीं थीं। एक चिड़िया बहुत छोटी,  शिशु अभी थी,  चिन्हकती थी, बोलती  तक थी  नहीं.. बहुत धीरे पिंहकती थी.. बज रही...

कभी चैन से मिलो तो कुछ बातें भी करूं।

शीर्षक:  कोई..! आने को.. है?   भावभूमि परिचय: 'जन्म या रूप ग्रहण' किसी भी चीज का हो संसार की पवित्रतम घटना होती है।क्योंकि वही कल का संसार बनता है, यही दुनियां का स्वरूप बनता है। अतः प्रसव काल सदा प्रसन्नता का मुहूर्त होता है। सभी को आने वाले का स्वागत खुश हो कर करना ही चाहिए यह अपेक्षित है। मूर्त होने की क्रिया, सृजन की क्रिया, कला संपूर्ति क्रिया, यज्ञ क्रिया और समस्त रजस विश्व का अनूठा प्रकटीकरण है यह उल्लास का विषय है। इसी पर कुछ शब्द आपके लिए प्रस्तुत हैं। कोई! आने को है,  हय...  हय!   क्या कोई आने को हय, क्या?  बज रहीं हैं घण्टियां... बेखबर...,बे-इल्तिज़ा...  मंदिर में इतनी.., देर.. से,  कितनी मधुर,  अब तलक .. कानों से अपने सुन रहा हूं..। कोई! तो पूछो?  क्या कोई!  आने को हय? क्या!  इकठ्ठे.... हो रहे.. है, लोग.., सारे..,   आज, क्यों.. इतने.. अधिक ? इस थान पे, क्यों हंस रही हैं... बालियां..,  हिलडुल.. मचलती, सरकती..ये पत्तियां, क्या कह रही हैं..  अधखिले इन फूल से.. सट,  पास इ..तना, मगन होक...

मत जोह मेरी बाट, अब मत देर कर..

अंतर्भावना परिचय:             समाज व्यक्तियों से बना है। सभी लोग एक ही आकाश के नीचे, एक ही पृथ्वी के ऊपर नियति नटी के दिए उपहार रूप उत्पादो का भोजन करते हैं और सुख सुविधाएं भोगते हैं। लेकिन हमारी स्वार्थ भावना और इकठ्ठा करने की प्रवृत्ति ने इस समाज में अनेक दुरूहताएं, गांठे, वर्गीकरण, मान-अपमान, भावनाओं के संघर्ष और विभिन्न द्वंद पैदा कर दिए हैं। जो अपनी आवाज अपनी दबी परिस्थिति के कारण नहीं उठा पाते वही एक दिन तूफान की ताकत लेकर उठता है। इसलिए समय से उनकी भी जरूरी समस्या को संज्ञान में लेना होगा। अन्याय और बार बात की ठोकर बड़े घाव बना देती है।                    इसी अन्तर्भाव को समेटते कुछ शब्द आपके पेशेनजर हैं आनंद ले बस:  शीर्षक:  अब मत देर कर.. मत जोह मेरी बाट,  अब मत देर कर.. देख अपने पास,  कोई दबा है! क्या?  न्याय की दरकार लेकर..  अनमना सा घूमता… है, या दब रहा है हृदय कोई,  भावना का बोझ लेकर,  रात दिन शामो-सुबह। ढूंढ उसको.. उससे बात कर,  उसके साथ चल!...

पवित्र अग्नि

(स्वरचित मूल रचना प्रथम प्रकाशित)  'अग्नि' क्या है?  संघर्ष है! उस 'द्वंद' का,  अंतर्बहिर.. चारों तरफ  मानव-मनों में.. लोक में..इस प्रकृति में.. हर एक क्षण, हर एक पल में..  ग्रथित है जो, आदि के आरम्भ से आज तक, अब तक यहां तक, सतत... शाश्वत, अनवरत, जो चल रहा है हर तरफ। .1 'अग्नि' क्या है?  बदल.. जाऊं.. नवल..अप्रतिम रूप! या आकार पाऊं..!  अन्यता के गुण समाऊं..!  स्थिति से पार.. पाऊं, आदि की यह आदि से अंतः क्रिया है।   बदलने.. की, चमकने.. की मुक्ति की, अडुसने की, आत्मलय की।  .2 'अग्नि' क्या है?  विश्व को यह.. बदलती.., परिशुद्ध करती घूमती है। रुक नहीं सकती, कभी ये.. वासना की, ध्येय है.. वासना से पार जाऊं, अग्नि में, मैं मिल समाऊं।  शुद्धता के पटल को अपना बनाऊं और क्या है अग्नि यह। .3 अग्नि क्या है रूप का.. अवसान है यह, परिवर्तन अनोखा, गुण छोड़ अपना गुण नए, आधान करना। टूट.. जाऊं, बिखर.. जाऊं,  विलग हो रेशों से.. अपने,  कोई नया.. परिधान पाऊं।  .4 अग्नि क्या है  युद्ध.. है, संघर्ष.. है, अंतर्कलह है!   ...

कुचलो न उनको.. प्यार दो..

भाव पृष्ठ : हमारे देश में आज भी अनेकों लोग, और जातियां, बहुत बड़ी जनसंख्या दुरूह पर्वतों, भयकारी जंगलों, बीरान मरुस्थलों, नम-कछारों, नदियों के डूब क्षेत्र और अगम्य स्थानों पर रह रही है या रहने को मजबूर है। उनकी सुधि इस स्वार्थ भरी दुनियां में, आपाधापी की दुनियां में कौन लेगा। वे निरीह, अनपढ़, अनगढ़, भोले लोग हैं, पर विदेशी नहीं, विशुद्ध भारतवासी है हमारे सगे ही है। उनके लिए कुछ सकारात्मक होना चाहिए।उन्हें कैसे मुख्य धारा में समायोजित किया जाय सोचना होगा। इसी को लेकर कुछ शब्द है। इसे मात्र केवल प्राणन की दृष्टि से लिखा गया है। मानव को उसका समुचित हक मिले, जीने का मार्ग मिले यही सच्चा कर्म हैऔर मानव धर्म है। अतः आपके संस्पर्श हेतु स्वरचित मूल, नव्य रचना प्रथम बार प्रस्तुत है:  प्रथम पुष्पांतरण: कुचलो न उनको प्यार दो.. पूछता हूं?  तुम्हीं…. से मै, क्या? यहां…कोई नहीं है !  आवाज देकर, थक चुका हूं!  कितने गहरे! गड़ गये सब!  हैं कहां! अब। सही में,  क्या!  सारे पहरे! हट गए अब!  शांति और विश्रांति है, अब?  सोच कर हैरान हूं!  कैसे मैं जानूं,...