कइ मर्तबा, कई लाइने

क्षणिकाएं: 1

मैं नन्हा 

हिलता डुलता ‘दीपक’

मद्धिम प्रकाश लिए

सच्चाई, सबकी 

मेरे प्रकाश में अंदर बाहर 

हृदय तक की भी दिखे।

क्षणिकाएं: 2

मै बांस की 

रूखी सूखी बांसुरी!  

कट छील कर बनी,

मिठास सबके मृदु मधुर

रसीले होठों की 

मेरे ऊपर खिली।

क्षणिकाएं: 3

नेह होगा, 

स्नेह को वह खोज लेगा,

हर अंधेरे रास्तों पर 

साथ देगा..

एक दीपक, 

रख चला, मेरे लिए वह..

चांदनी आए, 

रहे, या लौट जाए..।

प्यार उसका 

जल रहा मेरे लिए,

मेरे रास्तों पर उम्र भर

उजाला लिए।

क्षणिकाएं: 4

सुख दुख के संग 
उपजी 
इसीलिए शायद
उनमें गहराई तक 
लिपटी
स्नेह की मिट्टी।

जो, कभी न 
छूटी...
लगी रही तनमन के 
आंगन 
अंदर से अन्तस में 
पुती। 

दुख सुख से 
निकली, 
सुबहो शाम  
गरीबी की 
गर्म चाशनी में लिपटी 
इसी लिए शायद
हम सबमें 
भीतर तक समसी
आपसी 
नेह की मिट्टी।

क्षणिकाएं: 5

तूझसे न बनी कहते..

न मैं अब.. 

सुन... ही पाता हूं

मेरी नजर तेरे ऊपर

चिपकी रही, 

हर एक, पल पल

सच कहूं अब तो मैं तुमपर 

ध्यान भी लगाता हूं।

कोने में क्यों बैठे हो, 

इतने दिनो से

बाहर भी निकलो, कभी

तेरी याद में मैने 

न जाने कितने 

सजदे... किए हैं, 

रो के नहीं 

हर बार हंस-विहंस के।

क्षणिकाएं: 6

कइ मर्तबा, कई लाइने
उभ चुभ 
उभर कर सामने
चमक जातीं 
इस तरह
मैं मूक होकर... 
देखता हूं.. 
अंजान हूं! उदय होते 
भाग्य से, 
उन लाइनों के।

कौन सर आंखों 
चढ़ेगा..
कौन भू पर 
पतित होगा..
क्या जानता है?  
जनक कोई... !
खेलते है सामने जब 
बाल शिशु सब सामने ही
आंगना में। 

जय प्रकाश मिश्र



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