यारों! यही तो, वह जिंदगी है..
पक्ष एक: भावात्मक जीवन
एक फूल.. बोला..
मुस्कुरा कर...
कनखियों से..
पास.. एक् बैठी... चिड़ी से...
हम... एक ही हैं, देख तो, तुममें चहक... है,
मुझमें... महक है,
आ.. छू मुझे... कोमल परों... से।
अरे तूं मान मेरी!
यही तो..., है.... जिंदगी ।
फूल.. बोला
सोचता हूं, सिहर जाऊं...
कोमल सजीले.. पंख तेरे आज, छूकर..
सानिध्य तेरा पूर्ण लेकर...
दिल कर रहा है... बिखर जाऊं।
पांव तेरे, खुशबू थोड़ी..
अपने हृदय... की
प्यार से मै, खुद लगाऊं।
आ मिलें...
हम एक क्षण... को,
पास इतने..आज आपा भूल जाऊं!
पक्ष दो: यथार्थ
माली खड़ा था,
कट कर रहा था, आज पौधे
एक सीध में सब डालियां, भी कर रहा था
बाहर खिला था पुष्प हल्का!
बहुत थोड़ा!
हाय सारी! देखते ही देखते
ये क्या हुआ?
कट गई डाली वही...
प्रश्नगत यह पुष्प! जिसमे था खिला।
उड़ गई वह चिड़ी...
छूते.. फूल को...स्पर्श देती आखिरी
गिरने से पहले, पुष्प के, उस भूमि पर!
ले गई... सौरभ महकता... दूर वो
पांव... उसके महकते हैं आज भी
उस महक से..।
सोचता है चिड़ी वह! सच कहा था फूल ने..
हम एक हैं, दो नहीं... हैं!
दिल जुड़ गया है, कुछ इस तरह,
आज भी, उस फूल से।
पक्ष तीन: मौलिकता या अध्यात्म
और क्या!
क्या है, यहां... ?
एक क्षण का प्यार.. ही, यारों जहां..।
खेल अद्भुत है यहां...
यह विश्व... है.., आराम से..
जीवन है क्या!
यहां पर, क्या मृत्यु है!
सोच मत, सब, चेतना का खेल है।
रास्ता है, मार्ग है, रुकता नहीं है...
समय है, अनवरत चलता यहां. रुकता नहीं है,
यदि रुक गया तो मृत्यु है।
तुम ढूंढते हो
एक बसेरा भागती इस
बेल ऊपर चढ़ रही जो है निरंतर...धुंध में
तुम! रुक सको कुछ देर
और ले सको एक सांस...
इत्मीनान... से,
यार ये,
मुमकिन.... नहीं है!
यह जिंदगी... यार मेरे...
भागते..... इस समय नद... पर
तैरती.... यह जिंदगी... है,
रुक नहीं सकती कभी ये।
आगे तो... बढ़ ना.. रास्ता तो... दे मुझे..
बड़ी भीड़ है जाने से पहले.. देख तूं।
तेरे आने से पहले!
क्रमशः आगे पढ़ें..
जय प्रकाश मिश्र
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