पवित्र अग्नि

(स्वरचित मूल रचना प्रथम प्रकाशित) 

'अग्नि' क्या है? 

संघर्ष है! उस 'द्वंद' का, 

अंतर्बहिर.. चारों तरफ 

मानव-मनों में.. लोक में..इस प्रकृति में..

हर एक क्षण, हर एक पल में.. 

ग्रथित है जो, आदि के आरम्भ से

आज तक, अब तक यहां तक,

सतत... शाश्वत, अनवरत,

जो चल रहा है हर तरफ। .1


'अग्नि' क्या है? 

बदल.. जाऊं..

नवल..अप्रतिम रूप! या आकार पाऊं..! 

अन्यता के गुण समाऊं..! 

स्थिति से पार.. पाऊं, आदि की यह आदि से

अंतः क्रिया है।  

बदलने.. की, चमकने.. की

मुक्ति की, अडुसने की, आत्मलय की।  .2


'अग्नि' क्या है? 

विश्व को यह.. बदलती..,

परिशुद्ध करती घूमती है।

रुक नहीं सकती, कभी ये..

वासना की, ध्येय है..

वासना से पार जाऊं,

अग्नि में, मैं मिल समाऊं। 

शुद्धता के पटल को अपना बनाऊं

और क्या है अग्नि यह। .3


अग्नि क्या है

रूप का.. अवसान है यह,

परिवर्तन अनोखा, गुण छोड़ अपना

गुण नए, आधान करना।

टूट.. जाऊं, बिखर.. जाऊं, 

विलग हो रेशों से.. अपने, 

कोई नया.. परिधान पाऊं।  .4


अग्नि क्या है 

युद्ध.. है, संघर्ष.. है, अंतर्कलह है!  

न्याय की यह मांग.. है! 

परिणती है, स्थिति की, 

दुश्वारियों की...इस जगत में।

अंत है, मृत्यु है, परिवर्तन भी है यह, 

राख है अधिकार की,

पांडवों के महाभारत युद्ध की.. 

बहते हुए संताप की। .5


अग्नि क्या है

प्रश्न है! ज्ञानाग्नि से 

जो निकलता है नित नए 

तकनीक बन बन, आयुधों से

गगन में विध्वंश बन कर दीखता है 

युद्ध में, है प्राण लेता प्रजा का, 

गर्व भरता राक्षसों में।  .6


अग्नि क्या है? 

मैं खड़ा यह सोचता हूं 

आज भू पर! 

यज्ञ का साधन है, क्या?  यह! आज भी

जो सूक्ष्म करता तत्व को लाखोंगुना, 

है बांट देता, 

पा सकें सब हर जगह..

हर ओर देकर, हर किसी को बांट कर! 

समरूप कर कर, हर आहुति को!

विश्व का कल्याण जिसका ध्येय था।

विश्व में सद्भावना ही लक्ष्य था।

यह अग्नि क्या है! 

तुम ही बताओ, जानते हो अलग कुछ तो।

आज मुझको।   .7

जय प्रकाश मिश्र


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