प्यार की पलकों से छू,
मुस्कुरा..पहले थोड़ा..तूं
फिर, नजाकत.. को समझ..
बहुत धीमे.. बहुत हौले.. ,
प्यार से.. अब, पांव रख..।
दिल… है, ये!
दस्तक न देना, जोर से..!
दरवाजा.. नहीं है..
घर का… तेरे! ध्यान रख!
प्यार की पलकों से छू,
सज़दा तो कर!
नालायक.. है क्या?
यह, खुदा.. का, अपना ही घर है..
वजूखाना नहीं.. है मस्जिदो का!
चला आया यहां, चाहे जिधर से,
आ समाया, भीड़ में।
लगन…लग….
समय को, ताक पर रख!
खड़ा रह, जिंदगी भर!
कम है यह, इसके लिए!
दिल है यह..
पांव मत रख! सिर के बल चल!
पाकीजदगी का अंत है यह..।
देर लगती है यहां...
ये... ‘दरवाज़ा-ए-दिल’ है,
खुलेगा..., वक्त लेगा
रस्क रख
देर होगी, पर खुलेगा, एक दिन..
विश्वास रख।
खुलता गज़ब है।
जब खुलेगा...
समा.. जाएगा, सभी.. कुछ
दीखता जो कुछ, अलग है,
डूब… जाएगा उसी में.. धैर्य रख
सारा जगत यह।
बहुत छोटा...
इल्म.. तेरे पास है!
कोई नहीं... इससे बड़ा.... है,
मान.. मेरी,
संजीदगी से... छू इसे..,
सर माथे पे रख, धूल इसकी,
प्रेम से, दिल है यह।
पाकीजा-दगी का अंत है।
जय प्रकाश मिश्र
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