मणिबंध मुक्तक तेरे हैं ये...

तेरे लिए रखें हैं मैने, शब्द कुछ: 

सब कुछ.. संजों कर, 

रख दिया है.. 

शब्द में...  

जब.. 

याद आए, देख लेना,

पुर-जरूरत, जैसी पड़े, 

इक-नजर, 

एहसास जब, झीने... लगें

गहराइयां... कुछ कम लगें 

तुझे... जिंदगी.. में।

"जिंदगी 

बस आज तक है, 

जी.. इसे इस क्षण अभी" 

यही थे, वो शब्द!

रखे थे बचा तेरे लिए।

भाव: जिंदगी जो हम जी रहे हैं इसको जीने का तरीका महत्वपूर्ण है। कुछ विशिष्ट बाद में नहीं आएगा। हर क्षण बराबर ही महत्व का है प्रतिक्षण का संतोष, और चेतना पूर्ण जीवन ही जीवन का सार है।

मुक्तक दो: जो बेघर रहे हैं आज तक। 

एक खुली... दूकान 

छोड़े... जा रहा हूं, 

खास!  उन.. सबके लिए, 

जो पुश्त से दर... पुश्त, 

बेघर... ही जिए,

चमन में, इस आज तक, 

भागते... सपने लिए।


ताला रहित.. है, 

हर तरह, 

दीवार भी कोई नहीं.. है 

सामान जो चाहे! तुम्हें 

तुम खोज.. लेना, 

पलटना पन्ने.. मेरे, और ढूंढना 

कोई सतर..!  तुम काम की...

सीढ़ियां भी यही हैं.. 

रास्ता और कुंजियां भी..

जो देखते हो चमचमाता, दीप्तिमय

प्रासाद तुम।

तुमको मिलेगा सभी कुछ,  

...सच कह रहा हूं

बस उसे तुम चूम लेना, प्यार से...

पहनना, और ओढ लेना

जिंदगी में, जिंदगी भर।

भाव: संसार विद्या, युक्तियों, बुद्धि कौशल और सत्य के संस्पर्श से चलता है। ज्ञान, विद्या, शिक्षा आदि सब कुछ अच्छी पुस्तकों में गरीब अमीर सबके लिए रखा है। विद्या प्राप्ति में कोई दीवार नहीं होती। आज पुस्तकों को आसानी से ढूंढा और पढ़ा जा सकता है। उनमें दिए सार्वभौमिक सिद्धांतों को अपनाना, जीवन में ढालना प्रमुख है। उसी से दुनिया में सब कुछ पाया जा सकता है

मुक्तक तीन: तीर्थ थी यह देह तेरी

एक सुंदर धनुष है...

उग रहा.. आकाश में इस,

मैं देखता हूं!  

तीर, इस पर, प्रेम का.. 

रख कर चलाना, मेघ में... तुम! 

जो "जल" मिले.. उसे बांटना.. 

कोई महल.. सुंदर बनाना,; 

पर उससे पहले.. 

कारीगर... कहीं एक खोज लेना

भीतर ही अपने..

तीर्थ थी यह "देह तेरी", सोचना.... 

कहीं बैठ कर, एकांत में..

आगे कदम ले.. बढ़ते रहना....

निर्भय सदा संसार में।

भाव: हमेशा पॉजिटिव और उम्मीद से जिंदगी गुजारिए, परिश्रम करिए, ईश्वर सहायक होगा जो मिले उसे प्यार से मिल बाँट कर उपभोग में लाएं याद रखें आपका शरीर ईश्वरीय व्यवस्था के लिए बना है आप विशिष्ट हैं।

 जय प्रकाश मिश्र



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