कभी चैन से मिलो तो कुछ बातें भी करूं।

शीर्षक:  कोई..! आने को.. है?  

भावभूमि परिचय: 'जन्म या रूप ग्रहण' किसी भी चीज का हो संसार की पवित्रतम घटना होती है।क्योंकि वही कल का संसार बनता है, यही दुनियां का स्वरूप बनता है। अतः प्रसव काल सदा प्रसन्नता का मुहूर्त होता है। सभी को आने वाले का स्वागत खुश हो कर करना ही चाहिए यह अपेक्षित है। मूर्त होने की क्रिया, सृजन की क्रिया, कला संपूर्ति क्रिया, यज्ञ क्रिया और समस्त रजस विश्व का अनूठा प्रकटीकरण है यह उल्लास का विषय है। इसी पर कुछ शब्द आपके लिए प्रस्तुत हैं।

कोई! आने को है, 

हय...  हय!  

क्या कोई आने को हय, क्या? 

बज रहीं हैं घण्टियां...

बेखबर...,बे-इल्तिज़ा... 

मंदिर में इतनी.., देर.. से, 

कितनी मधुर, अब तलक ..

कानों से अपने सुन रहा हूं..।

कोई! तो पूछो? 

क्या कोई! 

आने को हय? क्या! 


इकठ्ठे....

हो रहे.. है, लोग.., सारे..,  

आज, क्यों..

इतने.. अधिक ? इस थान पे,

क्यों हंस रही हैं... बालियां.., 

हिलडुल.. मचलती,

सरकती..ये पत्तियां, क्या कह रही हैं.. 

अधखिले इन फूल से.. सट, 

पास इ..तना, मगन होकर! 

क्या कोई आने को है..., 

हय! हय, 

कोई आने को, है.. क्या! 


हवा के पर...चढ़ा

तैरता...,

उड़ता.. ये.. सौरभ

आ रहा है...,किस जगह से! 

क्यूं बादल.. व्योम  में..हैं, खेलते 

मंडरा... रहे हैं, इस तरह? 

क्या कोई आने को है- है 

क्या! कोई आने को है क्या!


रागिनी यह बज रही है 

आज, कितनी देर से

पंछियों संग.. सुर मिलाकर

झमझम, झमाझम 

झमकती आ!  हा! 

नये सुर ताल में।

क्या कोई आने को है- है 

क्या! कोई आने को है क्या!


झकोरा..., 

पवन का.., क्या कर.. रहा.. है 

उपवनों में.. कूजता है

इठल करता, घूमता है कोपलों के अंक में।

छिपा है कौन... मदराता मधुर.. 

अमराइयों के गुंजनों में।

क्या! कोई आने को है-है 

क्या! कोई आने को है क्या!

जय प्रकाश मिश्र

कदम.. दो: कुछ लोग फिज़ा होते हैं, 

कुछ लोग.. फिज़ा होते हैं, 

बदल देते हैं.. तसवीर 

दिलों के भीतर सबके

जैसे, भी जहां रहते हैं ।


टकराते.. हैं, छू जाते.. हैं, 

पास नहीं, दूर 

से भी गुजर जाते हैं, 

आते जाते, अनचाहे, अनायास

नजरों में समां जाते हैं।


जिंदगी के 

जिन मोड़ों पे भी

मिल जाते है.. 

सूंकूं की एक सांस 

ठंडी सी, 

लोगो में भर जाते हैं।


सूंकूं कैसा, 

दर्द नहीं बोलो, उसको! 

चुभन.. हो हरा, 

उभरा! उभ चुभ करता..थोड़ा थोड़ा..

जो सराहा हो गया..कहीं भीतर से।


भीतर ही भीतर.. 

जो समसता रहता, 

तान बितानों को 

बेवजह ही खड़ा करता,

न चाहने पर भी, चुपके चुपके

वो दिले-पैगाम थमा जाते हैं।

क्या कहूं! मैं थोड़ा जल्दी में हूँ! 

कभी चैन से मिलो 

तो कुछ बातें भी करूं।

जय प्रकाश मिश्र

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