मैं नया.. सूरज बनूंगी!
आज सूरज बंद था,
कमरे में अपने..
सुबह से.. नाराज था,
निकला नहीं था.., एक पल.. को
न जाने क्या.. हुआ था.. खेल
चकरघिन्नी काटते!
इस नियति के ब्रह्मांड में।
कौन जाने! क्या हुआ था।
विवश थे सब! चुप खड़े थे!
सबेरा! क्या करे!
गुमसुम खड़ा था, वहीं बाहर,
ऊंघता परवश पड़ा था!
चिड़ियां चहक कर कुछ देर...
सुंदर.. दिन खिलेगा,
आस करतीं
जोहती..
राह तकतीं
कुछ देर तक, चुप हो शांत थीं।
मसकतीं
कलियां नवेली
चटकने को घनी आतुर
सौरभ भरे, निज अंक में..
तैयार थीं,
रूप.. का श्रृंगार कर कर,
झांकती.. चौखट पे आकर,
लौटतीं..संतप्त थीं।
हवा ताकत भरी थी..
पर खड़ी थी!
सोचकर बेहाल थी,
कैसे.. बहे,
कब तक.. बहे,
कितना.. बहे, रुख भाँपती..
उन सूर्य.. का
हाथ जोड़े नम्रता से
खड़े-खड़.. पदचाप उनका जोहतीं थीं..
कांपती थीं, एक कोने
मोड़ मुंह,
नीचे खड़ीं थीं।
एक चिड़िया बहुत छोटी,
शिशु अभी थी,
चिन्हकती थी, बोलती तक थी
नहीं..
बहुत धीरे पिंहकती थी..
बज रही हो पैंजनी..
कोई मधुर...
लघु बालिका के पैर में..
घुनघुनी.. सी, रंजिनी.. सी
बोल बैठी..., मां बता...!
इस भूख का... मैं क्या करूं!
दिन नहीं चढ़ता अगर,
तो बैठ जाएंगे सभी,
राह सूरज की तकेंगे मात्र बस!
चल.. निकल,
साथ तेरे, आज तो, मैं भी, चलूंगी!
देखना तुम! आज से!
इस भूख के परिताप से
मैं नया सूरज बनूंगी!
मैं नया सूरज बनूंगी!
जय प्रकाश मिश्र
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