भीग जाता हूं, भीतर तक

पग प्रथम:  सच्चाई की झलक

चीजे बोलती हैं, 
चुप रह कर,
ज्यादा जोर.. से
जब सुनेंगे..आप
थोड़ा ध्यान से।

आवाज
सच्ची.. होती है
एक ही होती है 
सबकी,
दुनियां भर में.. 
हर जगह.., हर समय..
अगर आवाज... है तो..
बिना.. सिखाए 
एक सी.. निकलती है।
खुद-ब-खुद,
इन सूर्य किरणों सी।
निकालनी नहीं पड़ती,
जी हां... 
वह खुद ही निकलती है।

“वही मात्र” होती है...
रोने में, 
हंसने में, 
खाने में, खोने में, 
सोने में
खुश होकर ठुमकने में,
दुख में...
गले की सिसकियों में..
और गले के बीच 
कभी कभी कोई चीज 
बार बार सी फंसने में।

गुनगुनाने में, मुस्कुराने में। 
चीत्कार.. में, 
करुण.. चितवन में
मस्ती में, अलमस्ती में
खिलखिलाते संग, किलकिलाने में।

भाषाएं नकली हैं,
मस्तिष्क में भरती हैं
बोलियां... छूती हैं, दिल.., 
तन, मन, चितवन..
तुरत जगातीं हैं, 
भावनाएं..
करुणा, प्रेम, निजता.. 
क्योंकि यह सबकी 
अलग… है बस
इसी लिए नहीं.।
इसलिए भी 
क्योंकि खा
जाती हैं
मात्राएं
भाषा
ओं
की 
अच्छी, अच्छी,
प्रेम में शून्य कर देती हैं; 
संबोधन, आवाहन और विसर्जन भी।
ये बनाई नहीं गईं
बनी हैं समय में 
ढलते ढलते
प्राणि और
प्राणों से,
चलती हुई सांसों से।
इसी लिए हर जगह एक सी रहतीं।


शीर्षक: तराना-ए-जिंदगी

इक समय था,

अपनों के लिए

’जहां’ में 

हमने, 

शिद्दत से 

बनाए थे अनेकों सुंदरतम..  

सुकूने.. खास.., मकान-ओ-मुकाम,

जहने.. शौक से।


सिमट गए, 

अपने में, सारे, 

जल्दी इतने! पलक! झपकते  

सब..के सब, कभी सोचा नहीं था,

जिनके लिए, सब कुछ किए, 

अपने ही वे, 

देखते ही देखते, ऐसे चले जाएंगे।

अब! तौलता हूं, जिंदगी को..

जिंदगी में तैरता हूं, आए दिन! 

खुद में ढूंढता हूं! 

अतीत और, आज को 

एक साथ, और फिर..

आखीर में

पुराने तब के देखे.. कुछ 

सुनहले सपनों में, समय असमय

घुप-चुप डूबता, बैठा रहता हूं।


हां

कभी कभी, 

उकता जाता हूं; 

सवाल अपने से, करता हूं,

जनाब! 

सच बोलूं! सबका.. ज़बाब! 

अपने तन में ही, सिला पाता हूं।

दुनियां… है! 

अपने रास्तो पे.. चलती है

कब.. किसी और की.. 

परवा.. करती थी, 

जो आज करती है! 


खोजता हूं!  

एक नखलिस्तान.. 

अब.. झूठ नहीं! सच कहता हूं.. 

खयालों.. में।

उसी में, उन्हीं में, उन पुराने 

लोगों में.. 

समय के पुराने कंबल में बचे.. खुचे 

एक एक रेशे का 

बारीकी से..

छानबीन करता, परखता हूं।


पुरानी स्मृतियों के साथ

अब तो मै, बैठ, तसल्ली से, 

देर तक बतियाता हूं।

उन्हे तो 

तब भी, कोई जल्दी नहीं थी,

आज भी नहीं है, 

इसलिए

सुकून के कुछ पल, रिश्तों की मिठास,

अपनो का साथ, यादों में ही सही

जब जब मन उकताता है

जी आता हूं।


यादें हैं 

ये कहां जाएं 

घटाओं सी घिर जाती हैं

बरसती भी हैं जब कभी अपने ही 

फोन की घंटी धीमे से बज जाती है।

भीग जाता हूं, भीतर तक

फ्रेश हो जाता हूं

यारों से थोड़ी देर बात होने पर

मैं पुराना वही मुच्छतंडा बन जाता हूं।


इनका 

क्या होगा ?  

जिनका शुरू से ही 

नहीं है, 

किसी पर भी

अटल विश्वास! 

किसे 

याद कर, ये 

ताजे होंगे,जिएंगे जिंदगी 

कभी 

जब बिल्कुल अकेले होंगे।

सचमुच ये 

तब जरूर पसंद की फिल्मों

नकली किरदारों को,

देख देख कर खुश होंगे।

पर वे कितना भीतर छू पाएंगे

दिल, दिमाग, इनका वर्तमान

यह तो आने वाला कल का समय ही

बताएगा। 

थोड़ा जल्दी में हूँ.. बाकी बातें कल 

करूंगा।

जय प्रकाश मिश्र


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