भीग जाता हूं, भीतर तक
पग प्रथम: सच्चाई की झलक
शीर्षक: तराना-ए-जिंदगी
इक समय था,
अपनों के लिए
’जहां’ में
हमने,
शिद्दत से
बनाए थे अनेकों सुंदरतम..
सुकूने.. खास.., मकान-ओ-मुकाम,
जहने.. शौक से।
सिमट गए,
अपने में, सारे,
जल्दी इतने! पलक! झपकते
सब..के सब, कभी सोचा नहीं था,
जिनके लिए, सब कुछ किए,
अपने ही वे,
देखते ही देखते, ऐसे चले जाएंगे।
अब! तौलता हूं, जिंदगी को..
जिंदगी में तैरता हूं, आए दिन!
खुद में ढूंढता हूं!
अतीत और, आज को
एक साथ, और फिर..
आखीर में
पुराने तब के देखे.. कुछ
सुनहले सपनों में, समय असमय
घुप-चुप डूबता, बैठा रहता हूं।
हां
कभी कभी,
उकता जाता हूं;
सवाल अपने से, करता हूं,
जनाब!
सच बोलूं! सबका.. ज़बाब!
अपने तन में ही, सिला पाता हूं।
दुनियां… है!
अपने रास्तो पे.. चलती है
कब.. किसी और की..
परवा.. करती थी,
जो आज करती है!
खोजता हूं!
एक नखलिस्तान..
अब.. झूठ नहीं! सच कहता हूं..
खयालों.. में।
उसी में, उन्हीं में, उन पुराने
लोगों में..
समय के पुराने कंबल में बचे.. खुचे
एक एक रेशे का
बारीकी से..
छानबीन करता, परखता हूं।
पुरानी स्मृतियों के साथ
अब तो मै, बैठ, तसल्ली से,
देर तक बतियाता हूं।
उन्हे तो
तब भी, कोई जल्दी नहीं थी,
आज भी नहीं है,
इसलिए
सुकून के कुछ पल, रिश्तों की मिठास,
अपनो का साथ, यादों में ही सही
जब जब मन उकताता है
जी आता हूं।
यादें हैं
ये कहां जाएं
घटाओं सी घिर जाती हैं
बरसती भी हैं जब कभी अपने ही
फोन की घंटी धीमे से बज जाती है।
भीग जाता हूं, भीतर तक
फ्रेश हो जाता हूं
यारों से थोड़ी देर बात होने पर
मैं पुराना वही मुच्छतंडा बन जाता हूं।
इनका
क्या होगा ?
जिनका शुरू से ही
नहीं है,
किसी पर भी
अटल विश्वास!
किसे
याद कर, ये
ताजे होंगे,जिएंगे जिंदगी
कभी
जब बिल्कुल अकेले होंगे।
सचमुच ये
तब जरूर पसंद की फिल्मों
नकली किरदारों को,
देख देख कर खुश होंगे।
पर वे कितना भीतर छू पाएंगे
दिल, दिमाग, इनका वर्तमान
यह तो आने वाला कल का समय ही
बताएगा।
थोड़ा जल्दी में हूँ.. बाकी बातें कल
करूंगा।
जय प्रकाश मिश्र
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