रूप कैसा निर्झरा, अजरा सजा है

पग प्रथम: 

क्या है? वह! 

जो.. मधुर… है, 

इस संपदा में, संतति, 

यश कीर्ति में! 

सुख, स्वाद है, आनंद है! 

क्या मधुकरी में! 

शीतल, सुगढ़, सौंदर्य है! 

शाश्वत भी है क्या? 

क्या शांति है? वह

जो तिर रहा है 

हर कोई 

उस 

छांव में, 

पास उसके 

जा रहा है.. तरी… लेकर..

विकल होता रातदिन! 

क्या है? वह! 

जो.. मधुर… है, 

इस संपदा में, संतति, 

यश कीर्ति में ।

भाव: संसार में हर कोई सुख, खुशी, और आनंद के लिए स्वार्थी हुआ जा रहा है। सोचने का विषय है कि क्या ये प्राप्तियां क्षणभंगुर, नाशवान और भयकारी नहीं हैं फिर हर कोई अपने जिंदगी की तरी अर्थात नाव लेकर इन्हीं में क्यों समा रहा है जबकि इनमें वास्तविक आनंद, दीर्घ कालिक आनंद, स्थाई आनन्द है ही नहीं। क्या वह आनंद मन बुद्धि की प्रशांति, और स्थिरता में है या धन, संपद या संतति और यश कीर्ति की अभिलाषा में है सोचना चाहिए।

पग दो: 

जो कुछ यहां 

तुम देखते हो, सुख सरीखा

छाया है यह, 

उस… मूल.. की, 

क्षणिक केवल.., अंश.. है

पागल हुआ है.. विश्व सारा 

ढूंढता है, आज जिसको,

रातदिन।

आ दिखाऊं मुख.., तुम्हें 

उस शांत, शीतल, झिलमिली.. 

रस झील का.., 

अमरित निकलता है जहां से

तन, बुद्धि में।

ओस की चादर लपेटे, 

चन्द्र किरणों पर बिछलती

आदि से यह आज तक 

वैसे खड़ी है...। 

कामना की धेनु सी 

पूर्ण करती 

कामना इस विश्व की।

भाव: सांसारिक वस्तुओं में और प्राणी सम्बन्धों में जो सुख, आनंद, खुशी, है यह उस नैसर्गिक मूल के सुख, आनंद और प्रसन्नता की  मात्र छाया है जो स्थाई नहीं हो सकती इसलिए आएं उस सार्वकालिक, सर्वस्थानी, स्थाई सत्ता का आनंद ले और उसका दर्शन और अवगाहन करें जो समस्त जीवन को कामना से दूर कर पूर्णकाम, आप्तकाम कर देता है। यहां अमृत की फुहार मन पर पड़ती है जिससे उसका गुण ही चंचलता का समाप्त हो जाता है।

पग तीन: 

छोड़ इसको, यह कुछ नहीं है..

परावर्तन मात्र है 

यह, 

उस राशि के आनंद का 

जो बह रहा है अनवरत 

तेरे शिखर से। 

तुम नाचते हो, देखकर, 

जिस रूप को 

वह झलक भी तो है नहीं 

इस झील का।

भाव: जिन खुशी और प्राप्तियों को लेकर आप संसार में फुले नहीं समाते, नाचने लगते है वह उस परम सुख और आनंद के रूप का परावर्तन मात्र समझो। वह आनंद की धार राधा रूप अपने ही शिखर बिंदु से अनवरत प्रवाहमान है। आओ उसका सामीप्य प्राप्त करें। मार्ग मात्र ध्यान से होकर जाता है।

पग चार: 

बंदरों सा 

कूदते हो नाचते हो, 

नाच कैसा, देखता… जग 

हंस रहा है,

आ इधर आ! 

आ दिखाऊं, देख तो! 

रूप कैसा निर्झरा, 

अजरा सजा है 

अप्रतिम 

उस नटी के…आनंद का।

आ पास आ! मेरे… 

मरे.. ओ! पास आ! 

भाव: हे! मर्त्य शरीर धारी आपकी सारी लीला और कारगुज़ारी अब छिपी नहीं रही विज्ञ जन आज की सभ्यता और जीवन के प्राथमिकताओं को देखकर हंसते हैं। बंदर से बुरा हाल आदमी का हो गया है। इसलिए कह रहा हूं आ अपनी मूल संस्कृति और सनातन ज्ञान विज्ञान की तरफ लौट आ देख तो कैसे अदभुत अनुभूतियों से सजा तेरा अतीत रहा है।

पग पांच: 

ये प्यास!  
सुख की.. क्यों लगी... 
तुझको... बता तो! 
आनंद क्यों... भाता तुझे...
मुझको... बता तो!

आह!... इतना!  
खोजता सौंदर्य! फिरता तूं यहां!  
इस चमन में,
क्यों संगीत तुझको खींचता 
अपनी तरफ है।

कुछ पुराना... ढूंढता है, 
इन्हीं में.. तूं
जो छोड़ आया है.. कहीं...
उस पार पीछे... सोच तो! 
क्या उसी को खोजता 
तूं जा रहा है आज तक जीवन में पूरे! 
सोच तो।
जय प्रकाश मिश्र


जय प्रकाश मिश्र

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