कुचलो न उनको.. प्यार दो..

भाव पृष्ठ: हमारे देश में आज भी अनेकों लोग, और जातियां, बहुत बड़ी जनसंख्या दुरूह पर्वतों, भयकारी जंगलों, बीरान मरुस्थलों, नम-कछारों, नदियों के डूब क्षेत्र और अगम्य स्थानों पर रह रही है या रहने को मजबूर है। उनकी सुधि इस स्वार्थ भरी दुनियां में, आपाधापी की दुनियां में कौन लेगा। वे निरीह, अनपढ़, अनगढ़, भोले लोग हैं, पर विदेशी नहीं, विशुद्ध भारतवासी है हमारे सगे ही है। उनके लिए कुछ सकारात्मक होना चाहिए।उन्हें कैसे मुख्य धारा में समायोजित किया जाय सोचना होगा। इसी को लेकर कुछ शब्द है। इसे मात्र केवल प्राणन की दृष्टि से लिखा गया है। मानव को उसका समुचित हक मिले, जीने का मार्ग मिले यही सच्चा कर्म हैऔर मानव धर्म है।

अतः आपके संस्पर्श हेतु स्वरचित मूल, नव्य रचना प्रथम बार प्रस्तुत है: 

प्रथम पुष्पांतरण: कुचलो न उनको प्यार दो..

पूछता हूं? 

तुम्हीं…. से मै,

क्या? यहां…कोई नहीं है ! 

आवाज देकर, थक चुका हूं! 

कितने गहरे! गड़ गये सब! 

हैं कहां! अब।


सही में, क्या! 

सारे पहरे! हट गए अब! 

शांति और विश्रांति है, अब? 

सोच कर हैरान हूं! 

कैसे मैं जानूं, 

क्या! तुम सभी, अब नहीं हो..

एक कोई…गर बचा हो, 

आवाज... तो दे! 

मैं सुन… रहा हूं

मैं, सुन रहा हूं, ध्यान से..

कोइ.. बोल भी तो! 


कहां हो तुम! 

क्या अकेले, पड़ गए हो? 

थक गए हो, फंस गए हो? 

दिया ले,  बैठा हुआ हूँ... रात से, मैं

राह तेरी ”तक” रहा हूं,  

यही पर, मैं रात पूरी जग रहा हूं! 


अरे ओ! जाहिल गंवारों…

आवाज दो….तो.., मैं सुन… रहा हूं! 

क्या डर गए हो?  

लड़ने से पहले मर गए हो? 

आवाज से भी परे हट, 

क्या नट गए हो! 

कहां हो, अच्छे भले थे 

आज तक तुम! 

कहीं से, कोई तो बोलो? 

क्या कहीं.. कोई सुन रहा है?  

बात मेरी! 


मैं पूछता हूं, 

अब सभी से,

बैठे हुए जो घेर कर, 

दशकों से उनको

जाल का फंदा बनाकर 

ठग रहे हैं..

बोलने तो दो उन्हें.., 

वो आगे तो आएं

जिंदगी की दौड़ में वो, पिछड़ गए हैं।

हवा तो दो, 

वो.. जी… सकें, 

रोशनी, सूरज की देखें, 

कभी… तो, वे।


तुम इस तरह घेरों न उनको।

छोड़ दो..

इज्जत की रोटी खा सकें, 

बाजुओं पर गर्व करके, 

देश को 

सम्मान से, वे, आगे 

बढ़ाते जा सकें, तुम साथ तो दो।


उन्हें कोई मार्ग तो दो।

दोष मत दो, जरा सोचो! 

क्या करें वे, अनपढ़े हैं, अनकढे हैं

उजाले से दूर हैं वो..

कुचलो न उनको.. प्यार दो..

सच कहूं! 

क्या कहूं मैं! मत सुनो! 

लो कह रहा हूं, हाय! 

तो फिर तुम सुनो! 

वे.., तेरे सगे.. हैं, विदेशी नहीं हैं

सोच लो, ध्यान से, 

कुछ ध्यान दो, सम्मान दो।

वे पीछे नहीं हैं, प्रकृति है,उन्हें मान दो।

जय प्रकाश मिश्र

द्वितीय पुष्पांतरण: जीवन में रिश्ते

छलते हैं, जीवन भर रिश्ते! 

ये, रिश्ते क्या हैं ?  

रिश्तों.. के, रेशे... अब थोड़ा 

दीख.. रहे हैं।

दीख रहे हैं, संबंधों के 

पृष्ठों के ऊपर, 

पर ऐसे क्यों हैं, सच बोलूं! 

अपने तो हैं! पर 

अपने ही "सुतरों" के जैसे 

टीस रहे हैं।

पूछ रहा हूं क्या भाया , 

ये, वो ही रिश्ते हैं! 

पा जिनको मैं फिरता था, 

फूलों न समाया...

इतने जल्दी हल्के हल्के

काम निकलते, ये तो सारे उखड़ रहे हैं।

स्नेह वही है अब भी अपना

पर नेह नहीं है, शायद इनमें ..

लगता है, मौसम बदला है, 

बाबू की, दुनियां आई है..

दुलहिनियां, लक्ष्मी में बदली

बदली मेरे घर.. छाई.. है।

एक सफर थी ये जिंदगी, 

कुछ तो बता गई,

वो...जो नन्हे-मुन्हे.. दुधमुंहे 

बच्चे, प्रियतर थे... 

कभी.., जां.. से बढ़कर

उम्र-ए-पड़ाव पर...,

उन्हें पहचँनवा तो गई।

जय प्रकाश मिश्र (अपने शब्द)



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