गगरिया में.. गेनवां...डुबय...उतराय..।

गगरिया में.. गेनवां... 

डुबय...उतराय....।

क्षनै भर लौके.., क्षनै भर कूदय...

क्षनै भर में बबुआ.. 

अरे! 

जात ई.. लजाय..।

गगरिया… में गेनवां... 

डुबत… उतरात।

भावार्थ: संसार में जीव और प्राणी थोड़े समय के लिए ही आते है और फिर विदा लेते हैं जैसे कोई गेंद पानी के पात्र में डूबती और तैरती है। पर इतने में ही उसका अहंकार उसे यहां नचा डालता है लेकिन ज्ञान होते ही वह आत्मभर्त्सना से लज्जा भी अनुभव करता है। 

आवत… गेनवाँ 

बड़ा निक… लागल.. 

आंगन में सोहरा… 

मैं, देहलों… गवाय,

गगरिया… में गेनवां... 

डुबत… उतरात।


कुछय दिन में गेंनवां 

तोता अस बोलय

देखि देखि छतिया... जाय रे जुड़ाय,

गगरिया में गेनवां, डुबत उतराय।

भावार्थ: इस संसार में जब संपदा या संतान मिलती है हो हम सोहर यानी मंगलगीत के आयोजन करते हैं प्रसन्न होते हैं। और बढ़त बढ़त सम्पद सलिल या जैसे जैसे और चीजे या सुख मिलता है हमे अपने में लपेटता जाता है। पर जीवन में स्थाई कुछ नहीं मिलता और छूटता रहता है।

कूदत गेनवां, 

मरम... मोहिं, बंधलस

उछरत 

बछरू अस 

थनय..  तर जाय।

भोरी भई मैं, सखि

देखि  ओहिका... 

मन से न उतरय, धरम... बनि जाय,

गगरिया में गेनवां डुबय उतराय।

भावार्थ: जैसे जैसे सांसारिक संपदा की प्राप्तियों होती जाती है वह हमारी अस्मिता बन जाती है जरूरत नहीं जरूरी अंग बन जाती हैं और हम गौ के बछरू सा उन्हीं के चतुर्दिक लगे रहते है और कुछ दिखता हो नहीं। और एक दिन धन ही हमार धर्म हो जाता है उसी में प्राण बसता है।

छलकत गेनवां 

डुबुकि अस मरलै 

पनियां की धरियां, मैं, गइलौं नहाय। 

तन मोर भीजय! 

अंग अंग मोर सीजै!  

मगन मैं गाऊं... 

जानूं न कैसे 

बिसरि सब... जाय

गगरिया में गेनवां.. डुबत.. उतराय...।

भावार्थ: चीजें अपनी पराकाष्ठा या चरम को भी एक दिन प्राप्त करती हैं और फिर क्या बसंत का अंत होता है, जीवन में अति के बाद विस्मरण और अंगों में पराभव का दौर भी आता है।

एक दिन गेनवां 

गगरिया के बाहर, सखि जाने कैइसे

निकसि अस.. आय..

देखत देखत.. गोहारूँ मैं जबलौ..

पनियां के सथवां.. बहत चलि जाय.. 

ढ़लकत.. ढूंमकत.. 

सपन मैं देखलौं.. 

गेनवां मोर कतहूं.. मिलत नहिं भाय..

गगरिया में गेनवां डुबत.. उतराय...।

भावार्थ: आखिर! एक दिन आया जब सारी संपदा और सांसारिकता देखते ही देखते समाप्त, अपने ही अंग शिथिल, कुछ भी वस्तुएं और अपने पराए लोग भी अब दूर हैं। जीवन अपना अंतिम एकांत ढूंढ ही लेता है और लो यह परिसमाप्ति।

गगरिया में गेनवां

डुबय उतराय, जानूं न सखि, मैं

कहां चलि जाय...

गगरिया में गेनवां डूबै उतराय।

कवन रंग गेनवां, 

कवन रंग पानी

गगरिया के रंग में सकल मिलि जाय।

प्रेम रंग गेनवां.., करुना रंग पानी..

देह की गागरिया गई रे हेराय.. 

पनियां के रंग में गगरिया ह्वई जाय 

देखत सकलै एकै ह्वई जाय.. 

गगरिया में गेनवां डूबै उतराय।

भावार्थ:  वास्तव में सब एक ही है, सारे जीव और जगत उसी का ही रूप हैं। समझ का अंतर है सब प्रेम और करुणा से ही बना है सारे वैविध्य धर्म के, कर्म के, जाति पातीं के काले गोरे सब जीवन तक ही हैं मृत्यु सको एक में मिला देती है। वहां सब बराबर ही होते है सारा वैशिष्ट्य समाप्त अतः समझ पैदा करें।

जय प्रकाश मिश्र

अत्यंत लघु रचना: प्रेम

प्रारब्ध है 

तो लब्ध ही है 

समय का बस फेर है

पर प्रेम, तो वह बीज.. है

फैली हुई है बेल जिसकी... 

देख तो.. सारे जगत में.

गुल खिल रहे हैं रोज ही

इस बेल के संसार में इस।

जय प्रकाश मिश्र



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