मां है वो! मां है सभी की।

मां की महत्ता पर एक संक्षिप्त कविता पढ़ें और मां की गरिमा को जाने वह जीवनदायिनी है। मां ने कहा था कभी जब असहाय और हर ओर से हार जाना तो मेरी गोद में हो मानना, बस ये सोचकर आंखे बंद कर.. आगे बढ़...ना।

एक तंतु था 

किसी देह का… पर वो 

बंधा, उर... से मेरे था;  

कुछ इस... तरह!.. कैसे कहूं! 

इस उम्र भर... 

हर एक क्षण 

अपनत्व की सीमा ही बनकर।


मैं…. 

जहां.. था

अलग न… था,

कभी... उससे।

जब तलक जिंदा रही वो

एक क्षण भी.. 

एक पल को… दूर मुझसे।


एक् सच कहूं!  

आज तक.. उसकी नजर से..

दूर मैं कितना भी था.. 

पर दूर न था... एक पल 

उसके... हृदय से।


हर... वक्त!  क्या कहते हो तुम? 

ये वक्त.. क्या है? 

आंधियों तूफान में भी...

वो नहीं.. कभी रख सकी..

है दूर.. मुझको,

इस वृद्धता की उम्र में भी

धुक धुक धड़कती, 

धीमे चलती, धड़कनों से..।


वो..

मां है, मेरी..! 

मैं... टुकड़ा हूं! उसका,

आखिर मैं! अभी जो कुछ यहां हूं 

पूरा हूँ उसी का! 

कौन होगा और ऐसा! 

मैं जुडुंगा जिसके तन से, और ऐसा,

इस तरह से।


मैं अंश हूं, 

वो अंशी है मेरी..

वो मां है मेरी.., मैं कौन उसका… 

बस समझ, 

मैं खुशी उसकी,..जीवन हूँ उसका।


मां बड़ी है! क्या... कहा? 

अपमान... मत कर! 

कोई कहीं हो.., बेशक बड़ा हो.. 

पर पुत्र होगा.. वो किसी का..।

सदा छोटा ही रहेगा 

हर कोई, 

आदि से ले आजतक.. 

मां से अपने..।

मां है वो! मां है वो! 
वह श्रेष्ठ है, वह ज्येष्ठ है, जीवन में सबके।

जे पी मिश्र 

चरण दो: 

बर्फ.. 
की ये चोटियां.. 
खामोश... हैं क्यों! 
पूछता हूँ.. खामोश है  "वह"... 
आज तक... बोला नहीं..क्यों? 

पूछता मैं थक.... गया, 
कुछ तो बता.... ईश्वर.... मेरे.. 
क्यूं बोलता तूं... है नहीं! 
उसने कहा तब...,!
चीख कर... 
चीत्कार कर! मेरे कान में...
सुनता नहीं क्यों..,

मौन हूँ मै! ..... मौन हूं मैं! 


बार कितनी कह चुका हूं, 
देख तो..।
ये चोटियां हैं... 
रूप मेरा.. 
आ इधर आ..! देख कैसा.... 
बादलों से... मैं ढका हूं...
सरसराती.... ये हवाएं... जो देखते हो
आ रहीं है...
घर से.... मेरे..
थोड़ा बैठ... इनमें।

आ चलें... उस ओर.. गिन कर
कदम थोड़े...,
शांति के विस्तार... में 
चुप चुप... अकेले।

देख चादर.....
ओस की..., मेरी है ये..., दूर तक फैली है जो..
श्वेत... वो...
जो बहुत ऊंचे.... दिख रहा है,
हिम शिखर.... सा चमकता... 
आकाश में.. 
पार उसके... 
उतरती उन घाटियों... में
एक सूरज और है...
चांद भी है...।

सच कहूं तेरे सिवा... 
और भी.... तेरी तरह
बच्चे हैं मेरे।
आज से सुन.. ध्यान से सुन! 
मौन हूँ मैं।
कभी आना मेरे घर! तुम फिर अकेले! 
तो बात करना मौन रहकर।
जय प्रकाश मिश्र


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