रोक दो नदियां ये सारी, आज ही वापस करो!


द्युति प्रथम: मत भाग पीछे चाहना के..

समुद्र था, वह

पर सोचता.. था, 

अनवरत! रात दिन..

आज भी खाली.. है..कितना! 

यही तो वह.. चाह! थी..

भरती... नहीं थी, 

उसी को ले जी रहा था..

सागर तो था, 

पर तृप्त... न था! 


भर गया! 

मै भर गया..अब! 

कंठ तक, पानी हुआ, 

अब! 

बस करो! 

सांस ले पाऊं, तो मैं, 

थोड़ी जगह! खाली करो! 

रोक दो नदियां ये सारी, 

आज ही वापस करो! 

अब!  सोच से..  वह तृ-प्त था, 

सं-तुष्ट था, परि-शांत था, 

स्थि-र भी था, और म-स्त था।


खारा....!  है पानी... 

सारा... मेरा! 

इक भाव.. आया, अंतर्मनों से..

वह क्या करे! एक सोच थी! 

छूटती ही थी नहीं.., 

अब!  वह विकल.. था, संतप्त था, 

सूखता था... कंठ उसका.. 

एक.... सच कहूं..

सब कुछ... वही था, 

जिसको लिए वह, पूर्व में ही, तृप्त था।


सच, यही है  

खेल है! यह विश्व, सारा...

मान मेरी..!  

सच.. कह रहा हूं..

सब सोच है, कौन क्या है, 

और 

मैं कहां हूं..! 

जो पूर्ण है तेरे लिए, 

सागर सरीखा, देख तो

वो विकल है, अंतर्मनों में, दुखी है

संतप्त है।



इसलिए तो कह रहा हूं: 

थिर रहो! 

हर भावना में, 

सोच से उन्नत रहो! 

प्रगति पथ पर तुम चलो...

पर वर्तमान से.. तुम तुष्ट हो।

जीवन यही है.. 

क्षण अनुक्षण जा रहा है..

जियो इसको.. चैन से... जाने न दो।

संतुष्ट रहते, तुम जिओ 

हर हाल में।

संतुष्ट होकर, तुम जिओ 

हर साल में।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: हमारा वर्तमान ही वास्तविक जीवन है। इसे पूरी शांति, स्थिरता, और प्रसन्नता से जीना चाहिए, साधन की सम्पन्नता एक मनःस्थिति है जो कभी पूरी नहीं होती वह चाहना की आग है बढ़ती रहती है। सागर भी अपने को अर्थात बड़ा से बड़ा भी जरूरी नहीं कि जीवन का आनंद ले रहा हो। शांति त्याग और वैराग्य में ही है। वासना की दौड़ अंतहीन ही है।

द्युति द्वितीय: नाम क्या है! 

नाम.. 

क्या.. है, 

मूर्तता का इष्ट कोई..

पहचान है.. कि, अलग है वह, 

अन्य से..

प्रस्तुत हुआ है, दिव्य..हो! 

संसार में, प्रथम वह! 

किस बात की तस्दीक है, नाम.. यह।


मूर्तता.. क्या काल का परिणाम है; 

कुछ चल रहा था गर्भ में,

चुपचाप बिल्कुल..

शांति से।

मै क्या कहूं। 

क्यों बना.., बनता.. यहां पर, 

हाय! कुछ, सोच तो।


क्या घूमता है शब्द कोई.. कान में; 

अंतर्मनों में, बुद्धि में, जो

प्रेरता है, खींचता है

सतत आगे..

है बनाता रूप यह, 

चुन चुन कणों को

आकार देता, देखता है

अभीष्ट को, इस नाम के

नाम क्या है?  उपजता है यह कहां से? 

जय प्रकाश मिश्र

भाव: संसार में जो कुछ भी है चीजे या आकृतियां या लोग सबका नाम अलग अलग है। वह सब कुछ आवश्यकता के ही विशिष्ट प्रतिरूप है। जरूरतें चाहे मनुष्यों, प्राणियों की हो या प्रकृति की बिना इनकी जरूरत के कुछ नहीं बना। यह जरूरतें और उनका रूपीकरण ही संसार का स्वरूप है। यह जरूरत पहले मन में पैदा होती है भावना और सोच में एक स्पंद के रूप में रहती है और वहीं संसार बन जाती हैं। इस प्रकार यह परिवर्तन शील विश्व सूक्ष्म विचारों का ही प्रतिरूपन है। अतः हम मूल रूप से विचारों के संस्पर्श में ही होते हैं।

द्युति तृतीय: रहस्य क्या है विश्व का इस 

देखता, 

मैं समझता था

दैव का ही सब दिया है, 

इस धरा पर।

पर मानता हूं अब इसे 

पूरी तरह से।


पा रहा हूं सच!  इसे..

सोच! पर, 

चाहना! पर, 

दृष्टि पर!  संसार में

कोई नहीं अधिकार, अपना देखता हूँ।


स्पंद बन ये घूमते है अंतरों में

हर किसी के..

रूप.. लेते, 

जग.. हैं बनते रातदिन

मैं देखता.. हूँ।

समझने अब मैं लगा.. हूं

बहुत थोड़ा 

हाय!  यह संसार मैं 

कैसे बदलता रातदिन।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: लोगो के विचारों, चाहना और भावना तथा कब कौन सा दृश्य किसी के सामने कैसा आ जाएगा जो उसे उद्वेलित किस तरह कर देगा इस पर अपने अधिकार बहुत कम हैं अतः विश्व का रहस्य की यह अन्तर्जगत की शक्तियों से ही चलता है मानना पड़ता है।



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