आदमी से आदमी ही निकाल लोगे! क्या बचेगा

भाव: दो शब्द उनके लिए जिन्हें लोग आदमी होते हुए भी आदमी नहीं ..... से भी कमतर मानते हैं। उनकी यथार्थ स्थिति, समस्या को जानने की कोशिश कभी नहीं करते पुनश्च दुत्कार देते हैं। ध्यान दें उनमें भी एक आप जैसी ही आत्मा होती है, पर दुर्भाग्य उनका पीछा नहीं छोड़ता या कर्म फल ईश्वर जाने! कुछ भी हो वे मनुष्य तो हैं। उन्हें कुछ मत दो, बात तो अच्छे से करो क्योंकि तुम तो अच्छे मनुष्य हो अपना परिचय ठीक रखो। इसी पर दो शब्द पढ़ें।

रोक, दो! 

तुम, भावनाएं रोक लो..! 

सामने कोई दीन हो..! 

मंगता खड़ा हो..! 

तो सोच लो.., 

एक बार गहरे सोच लो! 

मांगे… अगर, 

तुम दे सको… तो

दे ही…. दो।


न दे सको, यदि 

अगर तुम! 

तो.... मत भी दो।

पर शांत. हो! शांत.. हो! शांत... हो! 

इस समय..

तुम शांत.. हो, अंदर से अपने..

शांत हो, बस इतना... करो! 


गौर.. से 

देखो… उसे…

उसकी अवस्था.., हाल.. क्या है..? 

दशा.. क्या है? ध्यान दो! 

सच सामने.. है, 

या छुपा.., पीछे कहीं है.. 

दूर है, या.. 

रक्त रंजित सामने ही, 

वह खड़ा है? पहचान तो।


व्यथा… देखो!  

शब्द की, आर्तस्वर की! 

कितनी झलक है,

झलक है, या झांकती है..! 

नेत्र से.., अधर से.., हर अंग से..।

क्या? 

व्यथा खुद.. बह रही है, 

कह.. रही है, 

मौन होकर! कुछ, तुमसे.. अलग से..

निकल कर.. 

चुपचाप कानों तक तेरे..

निकट से, पहचान तो।


पर न देखो! 

रंग उसका, चर्म उसका, 

वस्त्र उसका, ढंग उसका, 

जाति उसकी, धर्म उसका।


अवस्था पर ध्यान दो मत,

वृद्ध है, या बालपन का लेश है,

लवलेश है वह मूर्धता का!  

ध्यान दो मत! 


वह मुख्य है, 

क्षण को समेटे, 

सृष्टि बनकर ही, खड़ा है।

भूत है, वह… कर्म किसका… 

सामने तेरे… खड़ा है..सोच तो! 


कुछ भी न दो, 

तुम उसे...

पर ध्यान दो, वह आदमी है!

आदमी की अस्मिता लेकर खड़ा है..।


पहचान दो..तुम उसे, 

वह आदमी है 

किंचित उसे सम्मान दो।

वह नीच हो, जितना पतित हो.. 

पर आदमी है, आदमी का मान दो।

जय प्रकाश मिश्र


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