पग प्रथम:
इक जिंदगी उस पार... थी,
इक जिंदगी इस पार भी है,
बीच का ये रास्ता
संकरा बहुत है,
है कोई साथी मेरा क्या,
ढूंढता हूं..
एक घर बसाए, बीच में
इस
सुरसरी की धार में,
साथ मेरे, आज गहरे
तली में, इस गरजती मज़धार के।
भाव: जीवन की नदी दो पाटों के बीच बहती है।एक कर्म क्षेत्र होता है जो भागम भाग भरा आप धापी और प्रतिस्पर्धा लिए और दूसरा संयमन और शांति, का शारीरिक असमर्थता का आप दृष्टा मात्र रह जाते हैं। इनके बीच आपसी संपर्क तो रहता है पर अति संक्षिप्त लेकिन इस समय सच्चे साथी की जरूरत आती है जो सांसारिक बहाव के बीच अपने को स्थिर रखे और असहाय अवस्था में साथ दे।
पग द्वितीय:
है कहां वह लहर जिसमे भींग जाऊं...
कंठ तक आकंठ डूबूं...
सिहर जाऊं
ले चले
जो
साथ अपने
दूर तक मझधार तक,
छोड़े नहीं जो साथ, मेरा मध्य में
मैं साथ जिसके तैरता जग पार पाऊं।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: जीवन के अंतिम प्रहर में अच्छे ही नहीं सच्चे और ईमानदार साथी एवं मित्रों की जरूरत आती है जिनके साथ जीवन रस के साथ हंसी खुशी जीवन बीते और जीवन नैया पार लग सके।
पग तृतीय:
कुछ छिपा है क्या?
सभी में!
जो सालता है!
स्मृति बन! सांस में.... हर,
हम.... सभी को
खोज लेता है जगह...
हर उम्र के हर मोड पर..यह
क्या कहूं..
हाल सबका एक ही है
खाली हैं, सारे झूलने
चुप झूलते हैं,
रात भर
आंखे झुलातीं,
टूटती नींदों के पर चढ़
सच कहूं, हर करवटों संग
देखता हूं नित इसी संसार में।
जय प्रकाश मिश्र
जीवन और इसका मन सदैव समस्याओं को खोजता रहता है यदि सब कुछ सामान्य भी है तो भी शुभ और अच्छी जगह रुकता ही नहीं। कोई न कोई गड्ढा जरूर खोज ही लेता है और परेशान बना रहता है। यह समस्या हर उम्र और हर संवर्ग में सदैव बनी रहती है। यद्यपि जो कुछ अच्छा और उपयोगी अपने पास होता है उसे हम खाली झूले की तरह छोड़ देते हैं और अपनी रातों की नींद अनावश्यक रूप से संभावित; आने वाली समस्याओं, को लेकर मात्र कल्पना कर भय से खराब कर लेते हैं। इससे बचना चाहिए।
चतुर्थ पग:
एक पेड़ था,
दो साख थीं एक कट गई थी
बहुत पहले, इसलिए
की दूसरी बहुत आगे बढ़ सके!
जो बच गई थी..
लद गई थी.. फूल से..
गदरा गई थी.. महक से..
पर झुक.. गई थी;
मैने कहा जी! .. शर्म से!
उसने कहा ना फूल.. से!
दोनों सही थे,
सोचना
कभी फुर्सत मिले
मिल बैठ के।
पत्ते भी थे
शरमाया वहीं थे
डाल पर माते हुए
कुछ झड़ गए थे भूमि पर
फैले हुए थे, अटपटे से।
याद कर कर
खड़खड़ाते उड़ रहे थे
दिन पुराने
सोच कर वे फड़कते थे।
शायद हमारी ही... तरह
वे... लग रहे थे।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: बहुत बार घरों में एक भाई को आगे पढ़ाने और आगे बढ़ाने के लिए दूसरे को त्याग करना पड़ता है, घर मां, पिता, परिवार को संभालना पड़ता है वह अपनी पढ़ाई भी छोड़ देता है, और घर ही रह जाता है। जब की दूसरा पढ़ कर आगे निकल जाता है और धन, धान्य, संपदा से लद जाता है। कुछ समय बीतते ही वह अपनी अलग दुनियां बना लेता है और घर वाले को भूल जाता है। और अपने को इज्जतदार मान कर झुक कर चलता है पर मेरी दृष्टि से वह आंतरिक शर्म से शर्मसार होता होगा। अब हम लोग तो झड़े सूखे पत्तों से मात्र कुछ लिख और बोल हो सकते है कर नहीं सकते।
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