मैं बावरा ही रह गया..
पद प्रथम: मै कौन हूं
देखता हूं, आप को... (खुद को)
आश्चर्य होता है... बहुत
नस नाड़ियों... का जाल
सीमित देख कर, हैरान हूं।
माप जिसकी, अंगुलों.. में
फिक्स... है, मैं जानता.. हूं
कल्पना के पट.... अमित
इसमें छुपे.... हैं.. देखता हूं।
भावार्थ: अपनी खुद की और सामान्य आदमी की लंबाई साढ़े तीन हाथ अंगुलों में नाप सकते है, इतनी छोटी! और उसकी सोच की पींगे! अंतरिक्ष तक। कल्पना क्षेत्र 'आकाश-गंगा' तक। यह सीमित में असीमित का रूप देख कर आश्चर्य होता है।
उड़ रहा मन इंद्रियों
का साथ पाकर..
हिल नहीं सकती.. हैं
जो...
अपनी जगह.. से,
बाहरी संज्ञान
केवल, काम जिनका
आंतरिक यह शून्य है, अपने ही तन से।
भावार्थ: यद्यपि आदमी खुद उड़ भी नहीं सकता इसकी सारी मूल रचना शरीर में शरीर तक ही हाथ, पैर आंख, नाक ,कान, मात्र संज्ञान के साधन तक सीमित हैं। सारी इंद्रियां अपनी जगह वास्तुवत हैं अपनी जगह भी छोड़ कहीं जा नहीं सकती, मन भी इसके भीतर ही रहता है पर वाह! आदमी और उसके कारनामे विस्मय की चीज हैं।
उड़ रहा आकाश में,
अणुओं के भीतर
एक सा वह देखता हूं,
सीमित असीमित बीच
क्या संबंध है, मैं ढूंढता हूं।
आप में, संव्याप्त क्या है,
खोजता हूं।
एक, 'चिर' बैठा हुआ..
छुप कर यहां है...धड़कनों में,
खून की रंगत लिए
वह दौड़ता है,
कौन?
उसको, ढूंढता हूं।
देखता हूं इंद्रियों के
अवयवों को..
मांस को, इन हड्डियों को,
नाड़ियों को
चेतना से हीन हैं.., अपनी तरफ वो
कार्य करती टीम बन
एक साथ कैसे
खोजता हूं, ताड़ता हूं
आज इनको, खोजता हूं।
इसके भीतर जो आत्मतत्व है, जो आत्मन है वहीं मुख्य है। यही प्रक्षेपण और आरोपण और जग बुनता है यह निश्चित ही जानने की चीज है। इसका मार्ग बताया गया है और वह ध्यान मार्ग ही है आइए इसी पर चलते हैं और इसे आत्मतत्व की जानकारी शुरू करते हैं।
जय प्रकाश मिश्र
पद द्वितीय: कौन मेरे साथ है
मैं कहां हूं,
कौन मेरे साथ है,
मैं ही नहीं, वो भी नहीं
यह जानता…।
कितनी बड़ी
दुनियां यहां थी…
कितनी मेरे, हिस्से में आई..
मैं ही नहीं, कोई नहीं..
यह जानता…।
भावार्थ: जीवन और यह सृष्टि विचित्र है। इसकी सारी कार्य प्रणाली और गतिविधियां रहस्य से भरी हुई हैं। यद्यपि हमे लगता है कि हम सब कुछ जानते हैं पर यह सच है कि जितना हमे दिखाया और बताया जाता है उस शक्ति द्वारा हर आदमी उतना ही देखता और जानता है। यही नहीं जो जानता है वह भी उतना ही जितना नियति चाहती है। एक ही दृश्य को अलग लोग अलग तरह से देखते हैं और उन पर वहीं दृश्य अलग प्रभाव भी डालता है।
पद तृतीय: भ्रम ही जीवन सुख है
सोचता था..
प्यार उसने.., उम्र भर..
मुझको…किया, था
पर, कितना किया था..प्यार, मुझको..
हाय! उसने...
”मैं नहीं पहचानती .. कौन हो..तुम”
इसबार
जब.. उसने कहा था।
सच कहूं!
जान पाया आज अब
की प्यार तो.. उसने नहीं...
मात्र मैने,
आज तक उसको किया...था।
यह भ्रम ही था
पर सुनो तो, आज तक यह
मरे! जिंदगी की डोर तो था।
भावार्थ: लोग पूरे जीवन भ्रम में ही काट देते हैं आख़िरी में पता चला कि बेटा या धर्म पत्नी भी साथ नहीं निभा पाए। ये दुनियां है भ्रम और माया की नगरी! लेकिन इसी भ्रम में हो हम जीते है और सुख आनंद खीजते, पाते, संभालते, रहते है। इसी भ्रम में से ही यह क्षणिक सुख पसीजता है जिसमें सच लगता है काफी लस्ट भी होता है।
जय प्रकाश मिश्र
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