मत जोह मेरी बाट, अब मत देर कर..

अंतर्भावना परिचय: 

           समाज व्यक्तियों से बना है। सभी लोग एक ही आकाश के नीचे, एक ही पृथ्वी के ऊपर नियति नटी के दिए उपहार रूप उत्पादो का भोजन करते हैं और सुख सुविधाएं भोगते हैं। लेकिन हमारी स्वार्थ भावना और इकठ्ठा करने की प्रवृत्ति ने इस समाज में अनेक दुरूहताएं, गांठे, वर्गीकरण, मान-अपमान, भावनाओं के संघर्ष और विभिन्न द्वंद पैदा कर दिए हैं। जो अपनी आवाज अपनी दबी परिस्थिति के कारण नहीं उठा पाते वही एक दिन तूफान की ताकत लेकर उठता है। इसलिए समय से उनकी भी जरूरी समस्या को संज्ञान में लेना होगा। अन्याय और बार बात की ठोकर बड़े घाव बना देती है।                    इसी अन्तर्भाव को समेटते कुछ शब्द आपके पेशेनजर हैं आनंद ले बस: 

शीर्षक:  अब मत देर कर..

मत जोह मेरी बाट, 

अब मत देर कर..

देख अपने पास, 

कोई दबा है! क्या? 


न्याय की दरकार लेकर.. 

अनमना सा घूमता… है,

या दब रहा है हृदय कोई, 

भावना का बोझ लेकर, 

रात दिन शामो-सुबह।


ढूंढ उसको..

उससे बात कर, 

उसके साथ चल! 

सांत्वना दे, शक्ति दे, अपना समय दे।


क्या वहां कोई खड़ा है..

शांत हैं जो… 

देर से..थामे हुए है, 

ज्वार भाटा… अंतरों में…

हवा का रुख भांपकर,

चुप चुप खडा…. हैं, देर से।


हारा हुआ, महसूस कर 

जो घुट रहा है

द्वार पर..उस द्वंद के! 

जो कस.. रहा है, 

अजगरों सा कंठ उसका..

क्षण अनुक्षण..।


हां द्वंद हैं वे! चिंगारियां हैं! 

आग ही हैं! 

रोक दो!  इन सभी को 

जलने से पहले! 

 

सतह! 

सतह तो यह 

ऊपरी है..दीखती शांत ही 

और साफ भी, 

पर लग रही, कुछ खास.. है, 

इसकी बनावट..,  बदलती कुछ, 

कह.. रही है! 

नीचे दबा, 

कुछ उठ.. रहा है,

भाप है!  क्या...? 

अंतरों में आग.. भी है! जल रही... क्या? 

देख तो...! 


अंतर्मनों में पिघलता... 

अंतर्विरोधों में सना...

कुछ बह... रहा है, 

कोई द्वंद... है क्या? पल रहा? 

देख तो! 


कौन पहचाने इसे! 

कौन अनुमाने इसे! 

क्या कहीं कुछ है, हो रहा , 

शांत ही

सब चल रहा है।

इसलिए मैं कह रहा हूं..

मत जोह मेरी बाट, अब मत देर कर..।

देख अपने पास, कोई दबा है! क्या? 

न्याय की दरकार लेकर.. ।


शब्द पढ़ना कला है, 

मस्तिष्क की क्या..

कैसे पढ़ें वह! लाइनों के बीच में,

लिक्खी इबारत! सोचता हूं! 

अनपढ़े हैं, पर कढ़े हैं, 

जानता हूं।

शून्य में अटकी हुई यह 

शून्य में टांकी गई, जादूगरी है।

क्या? 

है कहीं, जादू कोई! 

कोई जो पास आए, 

फूंक से अपनी, समस्या को, भगाए।

इसलिए मैं कह रहा हूं

मत जोह मेरी बाट, अब मत देर कर..।

देख अपने पास, कोई दबा है! क्या? 

न्याय की दरकार लेकर.. ।


वह काटता है 

पैर मेरे, क्या करूं मैं? 

निकलते हर रोज हैं दशशीश..उसके 

क्या करूं..मैं! 

वह छीनता है हक.. मेरा, साथी मेरा..

देह मेरी.. आह! मुझसे, 

क्या करूं.. मैं,

पालता है, सींचता है, वह मुझे... 

हर रोज, मैं जिंदा रहूं... बस 

पत्तियां मेरी कुतर कर 

कुरकुराकर... रोज खाकर..

जश्न में डूबा रहे.. 

हर रोज..., वह! मै क्या.. करूं! 


वह “रोज” से खेले 

निरंतर,

मैं रोज ही जिंदा मरूं..जिंदा जलूं! 

बोल तो मैं क्या करूं!

इसलिए तो कह रहा हूं...

हो रही है देर, आ घर लौट आ

हो रही है शाम... अब घर लौट आ..।

सुन मेरी अब बात! तुमसे कह रहा हूं, 

आज फिर से...

मत जोह मेरी बाट, अब मत देर कर..,

देख अपने पास, कोई है! दबा क्या? 

न्याय की दरकार लेकर.. 

तो मान मेरी..ढूंढ उसको..

उससे बात कर, उसके साथ चल! 

सांत्वना दे, शक्ति दे, अपना समय दे।

(स्वरचित आज की मूल रचना) 

जय प्रकाश मिश्र


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