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Showing posts from July, 2025

दुनियां उठाए घूमता हूं, सिर पे अपने

एक 'दुनियां' ही.. लिए,  ढोता.. हूं, सिर पर,  रोज.. मैं,  अल..  सुबह से शाम तक!  जिंदगी.., ताउम्र... तक..,  उतरती.. ही,  नहीं  जबसे चढ़ी.. मस्तिष्क पर। थोड़ी... अलग है,  सच में यह,  दुनियां.. से तेरी,  शांत है वह!  बोलती, कुछ भी नहीं वह। स्वर.. तेरा है, जानता हूँ  गूंजता है,  गंभीर,... गहरा, हुंकता.. है,  कड़कता.. है, बादलों में,  तड़कता.. है टूटने से डालियों में रुनझुनाता.. झुनुकता.. है,  झुरुकता.. है पवन के संग पत्तियों के संचलन में। टुपकता.. है, टपकने.. से,  काली पकी, उन जामुनों,  महुवा चुअन में,  झर रहे, टुपटुप टुपुकते  मीठे.. फलों में,  गीत गाता छंद भर.. भर..  बदलियों के बरसने में,  बूंद-पत्ती के मिलन में। फूटता है, नदी की जल धार में, गरजता है सागरो में। जानता हूं मधुर हो तुम, रस भरे हो सहज हो, सौंदर्य प्रिय हो!   क्या.. इसलिए!  हमको बना,  मुख मोड कर, बैठे हुए हो। हे प्रभु मेरे!  प्रिय हो मुझे,  शक्तियां, अपनी.. प्रभो ..  हमको.. द...

एक पल की मित्रता.. क्या कुछ भी.. नहीं रे!

मुझको... लगा, कुछ भी नहीं.. है बीच.. तेरे, और.. मेंरे..., हम.. अलग हैं, तुम अलग.. हो एक पल की मित्रता..  कुछ भी.. नहीं रे!  पर, पा.. रहा हूँ,  जुड़ चुका हूं, कहीं... गहरे.., और.. गहरे....!  मित्र!  तुमसे..!  पर क्यों... लगा तब,  ऐसा मुझे? कुछ भी नहीं.. है, बीच.. मेरे, और.. तेरे...। अभौतिक रेशे कहीं हैं, खिंच.. रहे, बीच.. में, वे..., गठ गये हैं,  गांठ... ले..  मिल.. गए हैं, एक.. में, रज्जुओं.. से, कसे.. हैं, प्रिय.. बंधे हैं जियतार... हैं,  रे...!  सलीके से, रस.. लिए ये...  तंतुओं से.. एक रस हो  एक बन कर जम.. गए हैं, सोच.. में, मन मस्तिष्क से, होते हुए...  फंस गए हैं... हृदय की प्रिय.. ग्रंथि में। कैसे छुड़ा दूं तोड़ दूं!  वश का नहीं रे!  मुझको... लगा..था, कुछ नहीं.. बीच.. मेरे, और.. तेरे...,  अभी तो हम, कुंवर.. थे! तुम, कुंवरि रे!  हम.. अलग हैं, तुम अलग.. हो एक पल की मित्रता..  कुछ भी.. नहीं है... पर...!  दृष्टि..., यह...  मन...! बांधती  क्या ?  एक पल में! इतने.. गहरे!...

क्या! बॉयलर, फटने... को है..?

बॉयलर अर्थात् वर्तमान समाज और सामाजिक जिम्मेदारी का कंप्लीट सिस्टम, अगर समय रहते ध्यान न रखा जाएगा तो, विस्फोट की संभावना होती है। अतः जिम्मेदार और सभी जन मानस का काम है आपस में मिलजुल रहें। इसी पर दो शब्द आपके आनन्द के लिए। उसने कहा,  अब... बॉयलर,  फटने... को है...! मैने कहा!  क्यों क्या हुआ?  क्या... हुआ...है, बॉयलर...को.. कल अभी तो, ठीक... था, सीटियां थीं, लगी उसमें... सायरन की..  आहटों.. को, समझने.. की... क्या.. बजी थीं?  उसने कहा, 'हां' बजी थीं,  हल्की... सुनी थीं। शोर था हर ओर इतना,  दर्द था, चिल्लाहटें थीं,  बिखरी पड़ीं थीं जमीं पर,.. कौन सुनता! कैसे.. सुनता... जिम्मेदारी... थी,  जिसकी... सो.. रहा था,  सो.. रहा वह! आज भी..  उस तरह ही। मैने कहा... जब...  इमर्जेंसी..'पास...' था,  तो...  बॉयलर.. कैसे फटा..?  किसने... कहा की  फटा.. है!  अरे! बॉयलर 'फटने.. को.. है' !  उसने कहा,  हां,  पास.. ही तो, पास... था, बस एक, बाई...पास, था क्या... हुआ? उस पास का...! तो, सुनो... सच!  उसी ...

टेम्परेचर अधिक है, डाउन करो।।

जल.. रहा है, शहर.. कैसे,  देख... तो!  साथ, सब.. रहते.. नहीं हैं, ..  प्यार से, इन्हें देख.. तो, बिक.. रही शिक्षा..  यहां... की, बोलियों पे...  देख... तो!  चिकित्सा में लूट! प्रिय तूं देख तो!  असली नहीं हैं दवाइयां.. सत्य इनका देख तो..!  भ्रमित है, हर जन यहां, हर.. रास्ता..  'वह'.. क्या करे!  टेंपरेचर अधिक है..,  अरे! टेम्प...रेचर अधिक है!  कोई सुन रहा है?  मिल..इसे, डाउन करो, डाउन करो?  मूक हैं, कमजोर है वह,  ग़मज़दा है, उठे तो, किसके.. भरोसे...? सुनते.. कहां, अफसर.. यहां...हैं। एक वह दरख्वास्त दे.. दे..  थक गया!  दूसरा.., हर... फार्म.. भर भर चुक.. गया,  कोई काम होता है... यहां?   नौकरी.. मिलती... यहां?  वह! क्या करे?  सब..., ठग.. रहे, एक दूसरे को,  मिल.. यहां!  इसलिए तो कह रहा हूँ!  टेंपरेचर... अधिक है, टेंपरे...चर  अधिक है, डाउन करो, डाउन करो, फट न जाए बॉयलर यह दाब से!  उससे पहले...  कुछ करो,....  मिल सभी एक साथ जुड़, कुछ भी करो टेम्परेचर और बढ...

टेंपरेचर बढ़ा है.

टेंपरेचर बढ़ा है टेम्परेचर, बढ़ा.. है,  कुछ.. तो..., हुआ... है, मुझे लग रहा!  आदमी...  अब, आदमी... से  मांरली.., ऊपर... हुआ है। कुछ.. खौलता है!  सब के भीतर.., जाने क्या!  सोचता.. हूं, क्या आदमी यह!  आदमी सा बन रहा है.. या.., और भी.. बदतर... हुआ है। सब... और अच्छा, दीखता.. है,  सामने.., सच! शहर.. में, गांव.. में, हर गली.. में,  हर जगह.. लेकिन  यह... ढूंढता है,  उसी को  यू ट्यूब में, रील में, फिर न्यूज में। इस लिए तो कह.. रहा हूं टेम्परेचर.., बढ़ा.. है,  कुछ.. तो..., हुआ... है। देखता..!   ये... है, नहीं...  सामने... अपने यहीं..,  अवघात.. कितने घट.. रहे हैं, नित्य ही...  सब आम.. हैं, कह.. कोसता है, सोचकर!  मुंह.. मोड़ता है!  चुपचाप यह, वापस.. हुआ है।  अभी ही... वो! समस्या  या प्रॉब्लम, स्क्रीन पर दिख जाए गर ...  चल... रही, ट्रॉल होती देख! उस रंगी.. खबर  को... यह किस तरह, पागल... हुआ है। टेम्परेचर, बढ़ा.. है,  कुछ.. तो..., हुआ... है। उस, रो... रही,  फरियाद......

एक आईना था, दूर रखा..

शीर्षक: एक आईना था, दूर रखा.. आ.. बैठ लो,  मेरे पास, तुम.., बस  एक.. क्षण अब क्या बचा है, पास मेरे..  कुछ नहीं..,  तुम्हे दे सकूं, मैं.. सत्व, रज, तम!  एक आभा,  टिमटिमाती...  जल रही,  अवशेष.. अब!   इन अस्थियों का स्नेह लेकर..!  क्या बचा है पास मेरे..  छोड़ इन कुछ, अनुभवों... के कुछ, नहीं..,  तुम्हे दे सकूं, मैं.. और गुरुतर!  एक आईना था, दूर रखा.. चमकता..  उस..., धूप.. में, तब...  मैं, खो.. गया था, उसी... में,  इस! जिंदगी भर...। पास पहुंचा..,  दौड़ता...,  मैं हांफता...  सीढ़ियां... थीं, उम्र... की,  दहलीज सारी..,  पार.. करता जब, आईने.. के, सामने... मैं खड़ा था, ठगा था, मुझे.. आइने की चमक ने!  यह देखकर मैं, भौचका था!   सच! कह.. रहा हूं... कुछ.. नहीं था!  उसके पीछे..!  डरावना एक शून्य.. था। मैं.. दीखता था, खुद... जहां!   सच!   वहां पर..., वह..!  मैं नहीं था, एक भ्रांति.. थी...,   एक अंत था, केवल बचा, केवल बचा। मैं, वहीं.. ...

सत्य को ढूंढूं कहां?

शीर्षक: ज्ञान को ढूंढू मैं कैसे । एक कुआं..  बहुत.. गहरे!   चुप अकेले, घुप अंधेरे.. बहुत नीचे, जमी में है, दीखता वह है नहीं। पर  बहुत ठंडा,  और... शीतल..  रात.. दिन वह एक सा रहता सदा, सच कह रहा हूं। निथरा हुआ, त्रुटि रहित  पानी...  उसी... से निकलता है।  वह शांत.. है,  हर विकलता से रहित.. है बोलते.. उसको कभी,  किसने.. सुना है?  वह आत्मगत है...। ढूंढ लो कोई आदमी.. इस कूप सा, और फिर.., पानी पियो तुम.. ज्ञान का। शीर्षक: उस सत्य को ढूंढूं कहा?  सत्य.. है,  तो..., नग्न.. होगा आवरण.. से, हीन.. होगा धंसेगा, थोड़ा गड़ेगा,  चुभेगा भी  बस, इसलिए, की...  अखरा!  निरा..! वह सत्य होगा। चुप रहेगा, शांत होगा सहज बच्चा.. सत्य होगा, आडंबरों से दूर होगा। ढ़कोगे.. तो, झांक  लेगा..  वह हंसेगा,  एक दिन तुम्हे मोह लेगा, रुष्ट तो  बिल्कुल न होगा अगरचे.. वह सत्य होगा। जय प्रकाश मिश्र सद्यः मूल स्फुरित पंक्तियां दिनांक: २१.७.२५

पंछी! पग..ध्यान यहां.., आपनो न, कोई.

जीवन की यात्रा, पहाड़ी बर्फीले रास्तों से भी विकट है। जहां हृदयहारी प्राकृतिक सौंदर्य, तज मात्र अपने पग के नीचे की स्थिति से सजग रहना चाहिए, जीवन के हर पग में, सतर्कता चाहिए। इसी पर कुछ लाइने आप के आनंद की दृष्टि से। पंछी..! 'पग.. ध्यान'  यहां..,  आपनो.. न, कोई..., रंग, रूप.. बिखरो पडो, अद्भुत, अनोखो... तरो  मनोरम सों, दृश्य सगरो.. पर.., साथ नहीं... कोई..। पंछी! पग.. ध्यान यहां, आपनो न, कोई...। आगे.. चल, आगे.. चल,  पीछे...को,  न, ध्यान धर... चिंता... तूं छोड़, सकल.. चिंता... बस, अपनी.. कर। सारे... हैं, सजग.. यहां तोरो.. सो..,  न.. कोई... । पंछी.., पग.. ध्यान यहां, आपनो न, कोई...। सीधे.. चल, सीधे.. चल तल.. सो, न नीचे... बिछल औरन... की, सोच छोड़.. अपनी तूं...,  सुधी.. धर... बिछरिहैं...,  हर.. कोई...। पंछी..!  पग.. ध्यान यहां, आपनो न, कोई...। नील गगन, मस्त.. पवन.. मयूरी.. संग, मोर.. मगन छोड़ सारी.. पुरुआ पवन किसी... का, न..  कोई..। पंछी.., पग.. ध्यान यहां, आपनो न, कोई...। पग दो  संसार ऐसे तो कुछ खास नहीं, पर जब 'शंकरी' व्यापती है, तो आ...

ये दरारें हैं जिंदगी की कहां रख दूं!

भावभूमि: जीवन का यथार्थ कठिन ही नहीं कुटिल और कुत्सित भी होता है। पर बीते हुए समय कैसे भी हों अपना आवेश खो कर सामान्य हो जाते हैं। आज का युवा हररोज अपने यथार्थ से समझौता करके ही जी सकता है। लड़कर और हारकर उसे क्या मिलेगा एक अपमान और पश्चाताप! इसी पर आज के संघर्ष में पिसते हुए युवा भविष्य पर कुछ लाइने, आपके चिंतनार्थ प्रेषित हैं। आनंद भी आप ले और क्या कहूं। इस जिंदगी की, सलवटों... को,  जैसी भी हैं, आज.. जब, इन्हें, देखता.. हूँ,  मूर्ति.. हैं,  बेजान.. हैं, अब,  सच में.. सब... छांव में, आराम में,  शांति में, आनंद में इस... बैठ कर!  सोचता... हूं!  सच! कश्मकश.. थी,  जिंदगी यह... युद्ध... थी, संघर्ष थी, बाहर च भीतर। जीतना.., जरूरी.. था,  किस.. तरह, तब..!  यद्यपि.. अकेला ,  हमेशा अभिमन्यु था वह.. रनांगण में लड़ रहा व्यूह में...,  मैं जानता था, बात यह!  अच्छी तरह...। पर....  आज जब..  इस जिंदगी की सलवटों... को,  देखता.. हूं,  मूर्ति.. सी, बेजान..हैं,  सब!  बेजान..हैं,  सब!  आज भी है, युद्ध.....

दीवाना मेरा... हर हदों को है तोड़ता।

भावभूमि:  जीवन में कुछ लोग ऐसे भी मिल जाते हैं जो अब अपना अस्तित्व मात्र ही शेष हैं। स्याहछाया की तरह ही, जीवन जीना उनके लिए शेष बचा है। वह अघोर-अवघड संत तो नहीं, पर उनसे कमतर भी नहीं। आज फक्कड़, मस्त, बेखौफ वे जीवन के किसी मोड पर जीवन में गुंथे अनसुलझे अंतर्द्वंद्व में उलझ ऐसे हो गए। कुछ विचार ही होंगे जिनकी सोच इन्हें दीवानगी के उस छोर पर ले जाती है जहां से ये कभी, हमारी दुनियां में वापस नहीं लौटते। उन्हें समर्पित मेरी कुछ लाइने आप भी पढ़ें और आनंद लें। एक दिन,  सच! कह रहा हूं...,  सड़क पर, आते हुए... दूर.. से, देखा, उसे,  वह.. मस्तमौला..!  क्या आदमी... था ?    था..,  कुछ.. नहीं!  सम्राट.. हो, वह फ्रांस का..  कुछ इस तरह, बेफिक्र.. न्यारा,.. रौब.. में,  पग, रख.. रहा था। बीच..,  बिल्कुल,  सड़क.. के, आराम.. से,  सबेरे..,  मुंह अंधेरे, वो..., सैर.. के,  सर..., मूड में था?  पास उसके... हाथ.. उसके, साथ.. उसके,  आगे.. न, पीछे,  ऊपर से नीचे, कुछ.. नहीं,  कुछ.. भी नहीं, था..। वह मस्त.. था, मुक्त...

प्रकृति का यह.. नृत्य! सचमुच अलग है..

भाव: यह विश्व एक पहेली, पर.. कल्याण प्रद! जीवनता और अस्तित्व-वान इसकी विशेषता। काल का काला पट लपेटे, शून्य में सब डीडिंबित, संचलित, अपनी गतिलयता में व्यस्त, शून्य में अवस्थित पर चेतना पूर्ण, आनंद प्रेम और विश्वास की शक्तियों से परिचालित अदभुत है। इसी पर कुछ लाइने आपके मनोरंजन के लिए। आ.. चल,  मिलें...,  इस चेतना से,  हम.. कहीं, बिखरी.. हुई,  नव चंद्रिका.. सी हर.. कहीं। भाव: चेतना इस विश्व में ही नहीं,: प्रकाश सी सम्पूर्ण ब्रह्मांड में एकसार प्रसरित है। उससे अपनी चेतना को मिलाना आनंद का स्फूरन होता है। विश्व व्यापी चेतना की अवधारणा के साथ अपना अस्तित्व देखना अद्भुत अनुभव है। नजदीक.. से,  देखें .., उसे... भागीरथी....,   नई... एक्,   बनती.... हुईं। भाव: ब्रह्मांडीय चेतना में जब हम अवस्थित होते हैं तो लय विलय, ध्वंस और निर्माण की स्थितियों को महसूस करते हैं जो अनिर्वचनीय अनुभव होता है। आदमी....  एक.. चित्र है,  नेपथ्य... में,  इस प्रकृति... के,  जो.. सोचता है  अपने... तक बस उसके आगे...  कुछ... नहीं। भाव: मानव कुछ भी ...

हे राधिके! हे रस सु-रसिके! श्याम को झूलन चढ़ा ले

मित्रों! सावन है, बाबा भोलेनाथ का प्रिय महीना, श्रीहरि वर्षा-चौमास के चलते, बाबाश्री को लोक का संपूर्ण चार्ज देकर, शयन पर गए हैं। और भोलेआशुतोष से जो, जो.. चाहे इस दौरान ले सकता है। वह सकल मंगलकारी अर्धनारीश्वर रूप प्रसन्न हों। मेरी सभी के लिए श्रीराधा प्रसाद की कामना है जो सभी के हृदय को अपनी रससिध्दि से प्लवित, पल्लवित, पुष्पित और फल प्रसाद से भर देती हैं वह श्रीराधा इन पंक्तियों से प्रसन्न हों। हे राधिके! हे रस सु-रसिके!   सावन है रे...,  मेरो...  श्याम.. को, एक बार तो.. झूलन.. चढ़ा ले..। छोटो है रे, तेरे साथ खेलन चाहतो है, मत..,  मुकर रे!  मोरो श्याम.. को एक बार तो.. झूलन.. चढ़ा ले..। पेंग, हल्की.. मारियो रे... ध्यान रखियो... न.. टूट पाएं,  प्रेम.. की ये,  रस्सियां.. इन पेड़ की डालन नहीं,  बाँहन.. परी रे..  हे राधिके! हे रस सु-रसिके!   सावन है रे...,  मेरो...  श्याम.. को एक बार तो.. संग.. अपने,  स्नेह से, झूलन.. चढ़ा ले..। हुलसती.., चरमराती,   हुचुकती  ये  नम्र हैं रे!  देख... कैसे, ल...

वो नहीं इस.. बार था, बारिश.. में साथ।

जीवन पर लिखी कुछ विशेष लाइने आप के आनंद हेतु प्रेषित हैं। ईश्वर इन्ह शब्दों को इनका यथेष्ट प्राप्त कराए। याद आई, उम्र.. अपनी,  देख.. कर पेड़ो.. को उन, बगीचे... में नहीं थे इस.. बार की,  बारिश.. में साथ। लुप्त हो परिदृश्य से,  ओझल.. हुए!  खेलते.., कभी झेलते..  बगिया से इस, ग्रीष्म, आतप, शिशिर ठंडक,  बीच ही...,   भागते, भीगते ता-उम्र वे.... रीझते... किसी और पर,...   थामे.. हुए, कोई... और,  हाथ...। तुम गलत हो प्रिय,  बात वैसी नहीं रे! वे साधु... थे,  रीझते थे, प्रभु पे अपने पकड़े रहे .. दुनियां के हाथ। सच मान मेरी.. हम सोचते हैं, समझते हैं,  जी रहे हैं..  जिंदगी जो,  विश्व में इस,  वह सत्य से अति दूर.. है,  यह प्रभावित है, ग्रसित है, संकुचित है... वृत्तियों से, अनुभवों से,  स्मृति पटल पट..  बदलते..., पाटल.. के साथ। आ.. देखते हैं, क्या.. है ये... कुछ...  रख गए हैं, अक्षरों में,  समेटे.,,  शब्द.. की, इन झाड़ियों... में,  छुपाकर, बचाकर,  सतर.. की इन क्यारियों... में, जत...

क्या सत्य को हम जानते हैं।

भाव भूमि: संसार की पहेली, हर दिन नवेली, कौन समझाए किसे, सच में अलबेली। जितनी ज्यादा संवेदना से इसे लेंगे, उतना ही परेशान होंगे! इसलिए हमेशा  इसे  हल्के में लें, अपना काम आराम से करें, प्रायश्चित से बचें। जिस हाल में जो मिले प्रसाद मानकर खुश हो उसे अपनाएं। क्योंकि यहां जितने लोग उतनी दुनियां। उतने विश्वास और उतने ही सत्य। इसी पर कुछ लाइने मित्रों के आनंदवर्धन के लिए प्रस्तुत हैं। उसने..  पूछा !  प्यार.. से,  यह विश्व... क्या है?   मैने कहा... एक, रील चलती... और क्या है?  वास्तविक, भी है...  थोड़ी, समझो जहां तक,  भाव.. दो!  लादो जहां तक, माथ.. पे। देख ना!   कुछ, सरफिरे.. हैं,  सिरफिरे.. हैं, इसी में मस्त हैं, हर बात से, विश्व तो यह  एक ही सबके लिए,  उनके लिए,  तेरे लिए, मेरे लिए। उसने कहा... कोई बात... है, ये...  इतना... सभी ही, जानते...,हैं,  थोड़ा गहरे आओ,सत्य से  पर्दा..उठाओ, समझाओ थोड़ा, विस्तृत बताओ?  मैने कहा,   क्या...  'सत्य' को,  तुम जानते.. हो?  सच! ब...

फंस... गई, मछली... अचानक, क्या करूं! किससे कहूं !

भाव: दर्शन एक कठिन विषय है गूढ़ भी है, और उबाऊ भी। पर सरलता और सहजता से कहा जाय तो हर कोई इसमें पहुंच सकता है यह मेरा मानना है। जीवन दर्शन और यह विश्व व्यवहार एक ही है। जो देखा नहीं गया वह था ही नहीं क्या यह सत्य है। प्रमाण ही सत्य को भी स्थापित करता है। यद्यपि सत्य को प्रमाण की परवाह नहीं। आप कुछ लाइने पढ़ें और जरूर पढ़ें अंत तक शायद आपको कुछ मिल जाए मैं तो तब ही धन्य हूंगा।  फंस... गई, मछली... अचानक,  क्या करूं!  किससे कहूं !  कोई... नहीं...!  तो..  तूं... सही!  आ.. बैठ, मेरी, बात...  सुन..! क्या... यहां है,  बताना...?  इस  विश्व... में,  जरा...,  सोच के ...  लगाना..., तुम.. अटकलें..,  आराम से, पर... होश में।  बांट... दो,  तुम,  दो.. धड़ों... में,  विश्व.. को,  आराम... से,  क्या... हुआ! क्या हो गया..  नहीं, तो... मेरी सुनो!  एक, आत्म... है, संग.. चेतना... के, दौड़ता.. है, भागता है... दीखता.. है,  खुश.. कभी कभी....  गमजदा.... है!  प्यार में, मुफलिसी में, व्य...