दुनियां उठाए घूमता हूं, सिर पे अपने

एक 'दुनियां' ही.. लिए, 

ढोता.. हूं, सिर पर, 

रोज.. मैं, 

अल.. 

सुबह से शाम तक! 

जिंदगी.., ताउम्र... तक.., 

उतरती.. ही,  नहीं 

जबसे चढ़ी.. मस्तिष्क पर।


थोड़ी... अलग है, 

सच में यह, 

दुनियां.. से तेरी, 

शांत है वह! 

बोलती, कुछ भी नहीं वह।


स्वर.. तेरा है, जानता हूँ 

गूंजता है, 

गंभीर,... गहरा, हुंकता.. है, 

कड़कता.. है, बादलों में, 

तड़कता.. है टूटने से डालियों में

रुनझुनाता.. झुनुकता.. है, 

झुरुकता.. है

पवन के संग पत्तियों के संचलन में।


टुपकता.. है, टपकने.. से, 

काली पकी, उन जामुनों, 

महुवा चुअन में, 

झर रहे, टुपटुप टुपुकते 

मीठे.. फलों में, 

गीत गाता छंद भर.. भर.. 

बदलियों के बरसने में, 

बूंद-पत्ती के मिलन में।

फूटता है, नदी की जल धार में,

गरजता है सागरो में।


जानता हूं मधुर हो तुम, रस भरे हो

सहज हो, सौंदर्य प्रिय हो!  

क्या.. इसलिए! 

हमको बना, 

मुख मोड कर, बैठे हुए हो।


हे प्रभु मेरे! प्रिय हो मुझे, 

शक्तियां, अपनी.. प्रभो .. 

हमको.. दिए हो, 

हम.. क्या कहें, कैसे... कहें? 

निज.. स्वार्थ में, हम.. सन.. गए।

दूर तुमसे हो गए हैं।


एक् भय.. लपेटे, 

बदलते इस विश्व का, अनिश्चित भविष्य का

तन में मन में, हृदय में

निज दिव्यता को, भूल बैठे..,

दीनता को पहन कर हम, दुष्टता के संग बैठे।


इसलिए तो कह रहा हूं

अलग ही दुनियां लिए हम ढो रहे हैं,

अपने सिर पर, 

दिव्यता की जिंदगी को छोड़कर

निजस्वार्थ की, 

यह जिंदगी.., ताउम्र... तक.., 

उतरती ही है नहीं यह मृत्यु तक.

उतरती ही है नहीं यह मृत्यु तक।

जय प्रकाश मिश्र

मनुष्य को तपश्चर्या, त्याग, विवेक, आत्मानंद आदि दिव्य गुणों से संपन्न ईश्वर ने बनाया था आज हम अपने राग से पीड़ित, संबंधों से ग्रसित, मिट्टी की बनी भौतिकता में ऐसे फंसे हैं कि जीवन निकल गया हम उन्हीं में रह गए। इसी पर उपरोक्त लाइने आपके लिए थीं।




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