एक पल की मित्रता.. क्या कुछ भी.. नहीं रे!
मुझको... लगा, कुछ भी नहीं.. है
बीच.. तेरे, और.. मेंरे...,
हम.. अलग हैं, तुम अलग.. हो
एक पल की मित्रता..
कुछ भी.. नहीं रे!
पर, पा.. रहा हूँ, जुड़ चुका हूं,
कहीं... गहरे.., और.. गहरे....!
मित्र! तुमसे..!
पर क्यों... लगा तब,
ऐसा मुझे? कुछ भी नहीं.. है,
बीच.. मेरे, और.. तेरे...।
अभौतिक रेशे कहीं हैं, खिंच.. रहे,
बीच.. में, वे..., गठ गये हैं,
गांठ... ले..
मिल.. गए हैं, एक.. में,
रज्जुओं.. से, कसे.. हैं, प्रिय.. बंधे हैं
जियतार... हैं, रे...!
सलीके से, रस.. लिए ये...
तंतुओं से.. एक रस हो
एक बन कर जम.. गए हैं, सोच.. में,
मन मस्तिष्क से, होते हुए...
फंस गए हैं... हृदय की प्रिय.. ग्रंथि में।
कैसे छुड़ा दूं तोड़ दूं!
वश का नहीं रे!
मुझको... लगा..था, कुछ नहीं..
बीच.. मेरे, और.. तेरे...,
अभी तो हम, कुंवर.. थे! तुम, कुंवरि रे!
हम.. अलग हैं, तुम अलग.. हो
एक पल की मित्रता..
कुछ भी.. नहीं है...
पर...! दृष्टि..., यह...
मन...! बांधती
क्या ?
एक पल में! इतने.. गहरे!
मैं... जानता ही था नहीं...
प्रिय.. इससे पहले..।
मुझको... लगा, कुछ भी नहीं.. है
बीच.. तेरे, और.. मेंरे...अभी तो
वय किशोर, हम रे !
मुस्कुराहट बली.. है,
इतनी छली.. है,
भयंकर...,
मैं मानता ही था नहीं..,
पर देखता हूँ,
चांदनी.. सी, झर.. रही है,
इसमें... से,
मेरे... ऊपर पड़ रही है,
बिन तेरी, सच! उपस्थिति के,
तुममें.. से, रे!
अब हुआ अहसास, मुझको...
एक पल की मित्रता.. भी
कुछ.. तो, है.. रे!
चांद सी, तेरी मुस्कुराहट... झांकती है
मन.. में, मेरे..
निर्झराती बह रही है, शीतली है, सुखद है रे,
सावनी के पुष्प सी
हल्की गुलाबी
चू रही है,
मंद मंथर तरल गति से,
तन पे मेरे...
मुझको लगा अब...
कुछ तो है,
बीच तेरे और मेरे।
पग दो:
उसने पूछा
पुण्य.. क्या है, पाप.. क्या है
मैने कहा,
ये... कर्म... ही हैं पुण्य.. तेरे,
कर्म... ही हैं, पाप.. तेरे।
श्रेष्ठ.. हैं तो, पुण्य.. हैं
निकृष्ट हों तो, पाप.. हैं.. रे।
कर्म ही आधार बनते गुण के तेरे
अदृष्ट ही ये..
गुण.. तेरे, 'तुझे'.. बनाते है
आदमी से और बेहतर.., या
सबसे.. नीचे
जमा होते अदृश्य ही ये,
संस्कार बनते मेरे, तेरे।
जो साथ रहते सदा तेरे..
साथ रहते सदा तेरे..।
जय प्रकाश मिश्र
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