फंस... गई, मछली... अचानक, क्या करूं! किससे कहूं !

भाव: दर्शन एक कठिन विषय है गूढ़ भी है, और उबाऊ भी। पर सरलता और सहजता से कहा जाय तो हर कोई इसमें पहुंच सकता है यह मेरा मानना है। जीवन दर्शन और यह विश्व व्यवहार एक ही है। जो देखा नहीं गया वह था ही नहीं क्या यह सत्य है। प्रमाण ही सत्य को भी स्थापित करता है। यद्यपि सत्य को प्रमाण की परवाह नहीं। आप कुछ लाइने पढ़ें और जरूर पढ़ें अंत तक शायद आपको कुछ मिल जाए मैं तो तब ही धन्य हूंगा। 

फंस... गई, मछली... अचानक, 
क्या करूं! किससे कहूं ! 
कोई... नहीं...! 
तो.. 
तूं... सही! 
आ.. बैठ, मेरी, बात... सुन..!

क्या... यहां है, 
बताना...?  इस विश्व... में, 
जरा...,  सोच के ... 
लगाना..., तुम.. अटकलें.., 
आराम से, पर... होश में। 

बांट... दो, तुम, 
दो.. धड़ों... में, विश्व.. को, 
आराम... से, 
क्या... हुआ! क्या हो गया.. 
नहीं, तो... मेरी सुनो! 

एक, आत्म... है,
संग.. चेतना... के, दौड़ता.. है,
भागता है...
दीखता.. है,  खुश.. कभी
कभी.... 
गमजदा.... है! 
प्यार में, मुफलिसी में, व्याधि में, संताप में।

नाचता.. है, लूटता.. है
लुट.. रहा है,
रो रहा है, हंस रहा..
फिर बैठता, यह सोचता.. है,
आदि से ले, आज.. तक
सदियों.. से सोचो !  
किस तरह ..
गुत्थियां.. सुलझा रहा, 
उलझी... हुई.. यह।

फिर लौटता है, 
इसी में।
दुखी भी है, सुखी भी है, 
इसे ले, अंतर्मुखी है! 
जरा.. गौर दे, देखो इसे..! 
जरा.. गौर दे, देखो इसे..! 

दूसरा..वह भाग है
'अनात्म' यह...
फैला...हुआ, हर जगह, इस विश्व में,
सारे जहां, ब्रह्मांड.. में, 
हर जगह.. हर रूप में, 
हर आकृति, हर रंग में...।

चांद.., सूरज.., 
धरती... भी,  यह..
सब कुछ, जहां..., 
जो.. देखते हो! 
पड़ा है जिस हाल में।

और अच्छे.. सोच लो..
क्या...कुछ 
नया तुम देखते हो! 
और.. कुछ, है.. ही, 
नहीं...
इन्हीं... दो को, छोड़.. के।

तो.. क्या हुआ! 
बस.., ये न पूछो.., 
क्या.. हुआ? 
माजरा... सब छुपा है...
सच! इन्हीं... दो, के बीच में
इस घूमते ब्रह्मांड में।

परेशान... है, हम..., 
हम ही, नहीं...,
सारे यहां... सब..! 
जाने... न कबसे..! 
इन दो ध्रुवों के बीच में...!
इन दो ध्रुवों के बीच में...!

आओ चलो 
इसे सोचते हैं, क्या हैं ये,
इसे ढूंढते हैं।
थक गए हो, छोड़ दो..
तुम हल्के हो, 
इन सयानों के खेल में..।

तो..'चेतना' क्या चीज है? 
जो भागती है, दौड़ती है, उछलती है
कूदती, परवश बनाती, 
बांधती हैं, 
डोर में, संसार के,
पर.., मन नहीं है !  
काल्पनिक यह 
कल्पना के लोक में
यह वास्तविक है, धरातल पर
यथार्थ में, इस जिंदगी में।

यह, दुखी करती, सुखी करती, 
खुशी करती
घूमती..., है उम्र भर... 
अंत में ले डूबती.. मज़धार में..।
छोड़.. कर, 
सबकुछ...! यही पर,
प्रस्थान करती गगन में, 
अरे! कौन है रे!  विप्लवी यह! 
आ मिल, इसे.. हम, खोजते.. हैं।

चल बात सच्ची अब करें..,
जो सदा ही हो, 
एकरस.., 
सचमुच.. विरस 
संग.. उसके, हम.. चलें।

वह आत्म है, आत्मा है, 
बात उसकी, 
बहुत.. हल्के, मूड.. में 
हम, मिल करें...।

क्या है, यह सब! 
आत्मा.., यह चेतना.. 
घेरे... हमे!  
अये! कुछ.. नहीं रे! 
चेतना, एक स्फुरन है, प्रतिक्रिया है,
इंटर-एक्शन... है 
अनात्म की, 
फैले हुए संसार की जो देखते हो..
इन वस्तुओं की, प्राप्तियों की, 
सुख करी, प्रवृत्तियों की
सभी कुछ की
इस 
आत्म.. पर 
जो रमा है, भीतर तेरे, 
तेरे जन्म से, तूंही तो है, वो...
छाया... हुआ है, 
आदि से 
बस यही, संक्षिप्त रे! 
दर्शन है सारा, और माया खेल रे।

यह आत्म क्या है? 
ऊर्जा... है, 
एक जैसी... हर जगह
फैली.. हुई,
अनात्म, जड़.. इन जंगलों के 
बीच में, 
आदि से ले आज तक
अनवरत, 
संव्याप्त सारे प्राणियों में
मुक्त हो हर बंधनों से, पर..., सभी में।

देह से ये हीन है, 
इस लिए हर रूप में, 
हर रंग में
हर आकृति में, व्याप्त है, 
पर... दूर से।

सूक्ष्म.. है, 
अति.. सूक्ष्म है
सूक्ष्म.. से भी न्यून.. है
बस, ज्ञान.. की भाषा.. समझती,  
अक्षरों बिन, 
मूल में..,
भाषा से परे, हर जीव में,
इसलिए,
हर उलझनों से दूर है।
नित्य है, आनंद इसका मर्म है
सत्य है आवास इसका
पर हर.. आवास से यह दूर है।

बस एक ही है, कमी.. इसमें
यह प्रेम में, मजबूर... है।
यह प्रेम से मजबूर है।
बस इस लिए
देखती है प्रेम जब, आनंद मिश्रित! 
तो.. फंस गई मछली अचानक, 
क्या करूं! किससे कहूं, 
कोई नहीं, तो.. तूं सही! 
अब तूं ही सुन..
मेरी बात रे! 
क्रमशः आगे..

जय प्रकाश मिश्र


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