टेम्परेचर अधिक है, डाउन करो।।

जल.. रहा है, शहर.. कैसे, 

देख... तो! 

साथ, सब.. रहते.. नहीं हैं, .. 

प्यार से, इन्हें देख.. तो,

बिक.. रही शिक्षा.. 

यहां... की, बोलियों पे... 

देख... तो! 

चिकित्सा में लूट! प्रिय तूं देख तो! 

असली नहीं हैं दवाइयां..

सत्य इनका देख तो..! 

भ्रमित है, हर जन यहां, हर.. रास्ता.. 

'वह'.. क्या करे! 

टेंपरेचर अधिक है.., 

अरे! टेम्प...रेचर अधिक है! 

कोई सुन रहा है? 

मिल..इसे, डाउन करो, डाउन करो? 


मूक हैं, कमजोर है वह, 

ग़मज़दा है,

उठे तो, किसके.. भरोसे...?

सुनते.. कहां, अफसर.. यहां...हैं।

एक वह दरख्वास्त दे.. दे..  थक गया! 

दूसरा.., हर... फार्म.. भर भर

चुक.. गया, 

कोई काम होता है... यहां?  

नौकरी.. मिलती... यहां? 

वह! क्या करे? 

सब..., ठग.. रहे, एक दूसरे को, 

मिल.. यहां! 

इसलिए तो कह रहा हूँ! 

टेंपरेचर... अधिक है, टेंपरे...चर  अधिक है,

डाउन करो, डाउन करो,

फट न जाए बॉयलर यह दाब से! 

उससे पहले...  कुछ करो,.... 

मिल सभी एक साथ जुड़, कुछ भी करो

टेम्परेचर और बढ़ पाए यहां...

डाउन करो, डाउन करो।


कितनी... ज्यादा,  गर्दिशें... हैं, 

हवा... में, इस... मुड़... चलो, 

तपिश! कितनी.. 

काटती है, अंतड़ियां... 

तुम! मुड़ चलो,

उमस... कैसी, उड़ेलती... है, 

भभकियां...,

अब! बर्दाश्त से बाहर है मेरे...! 

बस करो..., तुम मुड़ चलो? 

टेम्परेचर... बहुत है...

अरे! कोई... है, यहां...! 

डाउन... करो? डाउन... करो? 

जय प्रकाश मिश्र

सद्यः स्वतः स्फूर्त पंक्तियां

आज अपनी सारी परेशानी का कारण मनुष्य खुद ही है। हम एक दूसरे से, और अपनी ही सरकारों से और न्याय व्यवस्था से प्रताड़ित! समाज में अनिश्चितता, आक्रोश, अभाव, कार्य के अवसर सब समस्याएं कंठ तक भर रही हैं। समन्वित प्रयास ही हमें इससे छुटकारा दिलाएगा। कमजोर, बूढ़े, और बच्चों के प्रति सद्भाव होना चाहिए। समाज में समस्या का एक मीटर होता है उसे एक सीमा से ऊपर नहीं जाने देना चाहिए। विस्फोट कभी तपका नहीं देखता सबको एक सा ही नुकसान करता है।

पग दो: 

एक... मौका, जिंदगी... है..

जी... इसे, स्थिर.. तो हो...!

गति.. छोड़ अपनी.. संग इसके बैठ तो! 

फिर न मिलेगी! 

बीत जाएगी, ये ऐसे भागने में,

दुबारा, ऐसी ताजी, फिर न मिलेगी।

इस लिए तो कह रहा हूं 

यह दुनियां... 

रंग.. बिरंगे.., पंख.. लगा कर 

चिड़िया... सी, उड़ती है,

आज..., 

जिस चिकने

संगमरमरी महल पर 

सुख से बैठती है, सुबह होते ही 

उसी से 

नीचे उतरती है।

जीवन आज का है, अभी का है

वह क्यों कल की बात करता है! 

ये मौका, 

और ये, हवा का झोंका

फिर मिलेगा तुम्हे ऐसे ही, दुबारा 

वो... झूठ बात करता है।

आज ही आपके लिए लिखा

जय प्रकाश मिश्र




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