क्या! बॉयलर, फटने... को है..?
बॉयलर अर्थात् वर्तमान समाज और सामाजिक जिम्मेदारी का कंप्लीट सिस्टम, अगर समय रहते ध्यान न रखा जाएगा तो, विस्फोट की संभावना होती है। अतः जिम्मेदार और सभी जन मानस का काम है आपस में मिलजुल रहें। इसी पर दो शब्द आपके आनन्द के लिए।
उसने कहा,
अब...
बॉयलर,
फटने... को है...!
मैने कहा! क्यों क्या हुआ?
क्या... हुआ...है, बॉयलर...को..
कल अभी तो, ठीक... था,
सीटियां थीं, लगी उसमें...
सायरन की..
आहटों.. को, समझने.. की...
क्या.. बजी थीं?
उसने कहा, 'हां' बजी थीं,
हल्की... सुनी थीं।
शोर था हर ओर इतना,
दर्द था, चिल्लाहटें थीं,
बिखरी पड़ीं थीं जमीं पर,..
कौन सुनता! कैसे.. सुनता...
जिम्मेदारी... थी,
जिसकी...
सो.. रहा था,
सो.. रहा वह! आज भी.. उस तरह ही।
मैने कहा...
जब...
इमर्जेंसी..'पास...' था,
तो... बॉयलर.. कैसे फटा..?
किसने... कहा की
फटा.. है!
अरे! बॉयलर 'फटने.. को.. है' !
उसने कहा,
हां,
पास.. ही तो, पास... था,
बस एक, बाई...पास, था
क्या... हुआ? उस पास का...!
तो, सुनो... सच!
उसी पर तो अनधिकृत
निवास था...
साहब का अपने... घर बना था..।
बंद है,
वह पास.. अब...
इसलिए... हालात, यह...!
की... बॉयलर, फटने... को है!
मैने कहा तब खीझ कर!
अरे!
एक छोटा 'कारगर'
सेफ्टी... का, वॉल्व... था,
क्या हुआ? उस.. वाल्व.. का!
मैं चुप.. रहा,
कहता... भी क्या..?
तुम्हीं ने तो चूड़ियां... कस कस
बिठा दीं
उस.. समय...
उस.. वाल्व.. पर!
जो.. सिसकतीं...थीं, रात भर..
रो... रही थीं, दर्द भर भर!
रोक कर उस दर्द को...
टीसते उस मर्ज को..
कैसे जिएं.. वे।।।
पूछता... हूं...! क्या करें वे..
इसलिए तो कह रहा हूं, बॉयलर फटने को है।
कुछ करो... मिल,
विस्फोट के,
प्रिय!
दंश.. अप्रिय..
से.., बचो.. तुम!
जय प्रकाश मिश्र
प्रार्थना: समाज में, जीवन के, हर पैमाने में, जब गहरी खाईं होगी तो, सब एक दिन उस में गिरेंगे ही। अतः समय रहते इसे मिल जुल इसे कम करा जाय।
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