सत्य को ढूंढूं कहां?

शीर्षक: ज्ञान को ढूंढू मैं कैसे ।

एक कुआं.. 
बहुत.. गहरे!  
चुप अकेले, घुप अंधेरे..
बहुत नीचे, जमी में है,
दीखता वह है नहीं।
पर 
बहुत ठंडा, 
और... शीतल.. 
रात.. दिन वह एक सा
रहता सदा, सच कह रहा हूं।

निथरा हुआ, त्रुटि रहित 
पानी... 
उसी... से निकलता है। 
वह शांत.. है, 
हर विकलता से रहित.. है
बोलते.. उसको कभी, 
किसने.. सुना है? 
वह आत्मगत है...।

ढूंढ लो कोई आदमी..
इस कूप सा,
और फिर.., पानी पियो
तुम.. ज्ञान का।

शीर्षक: उस सत्य को ढूंढूं कहा? 

सत्य.. है, 
तो..., नग्न.. होगा
आवरण.. से, हीन.. होगा
धंसेगा, थोड़ा गड़ेगा, 
चुभेगा भी 
बस, इसलिए, की... 
अखरा!  निरा..! वह सत्य होगा।

चुप रहेगा, शांत होगा
सहज बच्चा.. सत्य होगा,
आडंबरों से दूर होगा।
ढ़कोगे.. तो,
झांक 
लेगा.. 
वह हंसेगा, 
एक दिन तुम्हे मोह लेगा,
रुष्ट तो 
बिल्कुल न होगा
अगरचे.. वह सत्य होगा।

जय प्रकाश मिश्र
सद्यः मूल स्फुरित पंक्तियां
दिनांक: २१.७.२५

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