पंछी! पग..ध्यान यहां.., आपनो न, कोई.

जीवन की यात्रा, पहाड़ी बर्फीले रास्तों से भी विकट है। जहां हृदयहारी प्राकृतिक सौंदर्य, तज मात्र अपने पग के नीचे की स्थिति से सजग रहना चाहिए, जीवन के हर पग में, सतर्कता चाहिए। इसी पर कुछ लाइने आप के आनंद की दृष्टि से।

पंछी..! 'पग.. ध्यान'  यहां.., 

आपनो.. न, कोई...,

रंग, रूप.. बिखरो पडो,

अद्भुत, अनोखो... तरो 

मनोरम सों, दृश्य सगरो..

पर.., साथ नहीं... कोई..।

पंछी! पग.. ध्यान यहां, आपनो न, कोई...।

आगे.. चल, आगे.. चल, 

पीछे...को,  न, ध्यान धर...

चिंता... तूं छोड़, सकल..

चिंता... बस, अपनी.. कर।

सारे... हैं, सजग.. यहां

तोरो.. सो..,  न.. कोई... ।

पंछी.., पग.. ध्यान यहां, आपनो न, कोई...।

सीधे.. चल, सीधे.. चल

तल.. सो, न नीचे... बिछल

औरन... की, सोच छोड़..

अपनी तूं...,  सुधी.. धर...

बिछरिहैं...,  हर.. कोई...।

पंछी..!  पग.. ध्यान यहां, आपनो न, कोई...।

नील गगन, मस्त.. पवन..

मयूरी.. संग, मोर.. मगन

छोड़ सारी.. पुरुआ पवन

किसी... का, न..  कोई..।

पंछी.., पग.. ध्यान यहां, आपनो न, कोई...।

पग दो 

संसार ऐसे तो कुछ खास नहीं, पर जब 'शंकरी'
व्यापती है, तो आप एक 'तुच्छ रूप मात्र' में बंध अंधे हो, तड़पने लगते हो। इसी पर कुछ लाइने।

माना... 

दियार.. होता है, 

कुछ! ज्यादा..ही विशाल, 

होता है,

पर छोटा है, 

मैने, सिकुड़ते उसे, देखा है।

नन्ही.., नन्हीं... सी, मुँदी आंखों में... 

उतने.. ऊपर, टंगा..., अनंत ऊंचाई पर..

वह, अनंत... आकाश 

क्षितिज के साथ, 

मात्र एक विंदु में, समाता, 

लय... होते, देखा है...।

लेकिन उन्हीं आंखों में, नहीं... समाता, 

एक नन्हे... से

पुष्प का अनुपम.. सौंदर्य... 

बस.. उसे देखा, ध्यान से, 

ध्यान में खिलते हुए

कली से बढ़ते, फूल बनते हुए जब।

उम्दा कह देना, और उम्दा का 

बोध होना 

अलग अलग चीजें हैं।

उम्दा का बोध, बड़े से बड़े को 

कितना बौना कर देता है, 

क्षण भर में।

सच! क्षण भर में।

पग तीन

पूछ बैठा अचानक वह! 
अध्यात्म क्या है? 
क्या बताता? 
अभौतिक कोई चीज हो, 
पदार्थ हो!  
अस्तित्व, उसका मानना... 
चैतन्य उसको जानना
अध्यात्म है, 
और क्या है.,?  
आत्मा अध्यात्म की..
खुद आत्मा है, यही तो है।
पूछ बैठा अचानक वह! 

पग चार

उसने पूछा? एक दिन! 
तुम...
चेतना.. को जानते हो! 
मैने कहा, 
एक धार... है 
नाम जिसका 'चेतना' है,
करेंट.. है, अनुभूतियों... की 
इंद्रियों से..., बह रही.. निकलती, 
प्रिय! रसधार सी, मन जोड़ती
आत्मा से मिल रही..
जाग्रत हो जब तुम, 
बस.. तभी।
उस आत्मा.. को 
जोड़ती.. 
भीतर तेरे.. इस विश्व से 
चेतना... ही,   है... कड़ी।

उसने पूछा? एक दिन तुम! 
चेतना को जानते हो! 
साथ पढ़ती थी मेरे.., उस दौर में
मैं मौन था! 
बहुत ज्यादा कह गया था।
इससे ज्यादा क्या लिखूं।
चल! उस चेतना.. को 
आज... 
तेरी चेतना.. में छोड़ दूं।

जय प्रकाश मिश्र

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