दीवाना मेरा... हर हदों को है तोड़ता।
भावभूमि: जीवन में कुछ लोग ऐसे भी मिल जाते हैं जो अब अपना अस्तित्व मात्र ही शेष हैं। स्याहछाया की तरह ही, जीवन जीना उनके लिए शेष बचा है। वह अघोर-अवघड संत तो नहीं, पर उनसे कमतर भी नहीं। आज फक्कड़, मस्त, बेखौफ वे जीवन के किसी मोड पर जीवन में गुंथे अनसुलझे अंतर्द्वंद्व में उलझ ऐसे हो गए। कुछ विचार ही होंगे जिनकी सोच इन्हें दीवानगी के उस छोर पर ले जाती है जहां से ये कभी, हमारी दुनियां में वापस नहीं लौटते। उन्हें समर्पित मेरी कुछ लाइने आप भी पढ़ें और आनंद लें।
एक दिन,
सच! कह रहा हूं...,
सड़क पर, आते हुए...
दूर.. से, देखा, उसे,
वह..
मस्तमौला..!
क्या आदमी... था ?
था..,
कुछ.. नहीं!
सम्राट.. हो, वह फ्रांस का..
कुछ इस तरह, बेफिक्र.. न्यारा,..
रौब.. में,
पग, रख.. रहा था।
बीच..,
बिल्कुल,
सड़क.. के, आराम.. से,
सबेरे..,
मुंह अंधेरे, वो...,
सैर.. के, सर..., मूड में था?
पास उसके...
हाथ.. उसके, साथ.. उसके,
आगे.. न, पीछे, ऊपर से नीचे,
कुछ.. नहीं,
कुछ.. भी नहीं, था..।
वह मस्त.. था, मुक्त.. था,
फक्कड़... हो कोई
फकीर पहुंचा.., दिख रहा था।
क्या चाल थी!
नीचे धरा.. थी, पांव.. के,
सर.. बादलों की, छांव.. थी।
चलता रहा...
वह मस्तमौला सांड सा।
कैसा बताऊं?
स्निग्धता ज्यों तिर रही हो..
तेल की,
चमकती, हिलदुल, ढुलकती..
मोतियों के माल.. पर
सच!
छलकती...,
मुक्त हो, हिंडोल करती,
गले में.. कूदती, नवोढ़ा किसी
रूपसी.. की, चुलबुली.. हो,
उन..
रश्मियों सी, ओढ़ती कभी फेंकती
जो बांधतीं हैं मन मेरा!
हां.. उन्हीं जैसी..।
निडर हो, बेखौफ, चलते बादलों सा..
पग.. बढ़ाता, आ.. रहा था।
वह पास आया, और... मेरे,
देखता.. हूँ,
कल्पना की आंख से!
उड़ता हुआ, एक ख्वाब.. है,
वह!
धूमकेतू...!
सामने... मेरे खड़ा..।
सिरफिरा..
है, हदों.. तक,
हर.. हदों... को पार करता..,
कल्पना के परों पर..
बेलौस होकर चढ़ रहा, उतरता..
सागर लहर सा, लड़ता.. भिड़ता...
विचारों की उर्मियों संग
जूझता..
सामने वह.. आ खड़ा है।
पैदल, था वो..., गाड़ी में मैं,
मैं सोचता, हूँ आज
बैठा...
वह.. झूमता
आह! कैसा लग रहा था।
फेस..! काला कोयला,
चिटका.. हुआ
नजर कुछ ना, आ... रहा है।
खोजता हूं, ध्यान से,
देखता हूँ ध्यान से.. छाया को उस!
हैरान हूं!
एक में सब लय हुई हैं,
इंद्रियां..
मन कहां! तन कहां!
चितवन कहां!
और, वह..! कहां..
मैं क्या बताऊं... देखकर उसे,
मैं कहां?
पट फटे, निज़्ज़र झरे हैं
बांह पे,
हैं... मछलियाँ
कलाइयों तक शर्ट लटकी..
सच कह रहा हूँ!
फड़..र करती, फड़..र करती,
पैंट.. उसकी।
कितना खुली है, सामने से,
लेकिन उसे, है.. ग़म कहां!
दी..वाना है, मेरा... यार, वह!
दिखावटी.. दुनियां से, ऊपर
बेतकल्लुफ,
सब सुनो..
मेरा प्यार है वह, प्यार है वह।
जय प्रकाश मिश्र
आज सबेरे बीच सड़क पर एक विक्षिप्त आदमी स्याह चेहरा लिए आता दिखा। उसके वस्त्र फटे और विवर्ण चेहरा हवाओ से उड़ती फटी पैंट की मोहरी और बाजुओं पर फरर फरर उड़ती बन्होरी
देख कर मन द्रवित हो गया। इन लोगों के लिए मेरे ये शब्द उन्हें तो कुछ नहीं मुझे उनकी याद सदा दिलाएं ऐसे लोगों के प्रति हम जरूर विनम्र रहें।
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