हे राधिके! हे रस सु-रसिके! श्याम को झूलन चढ़ा ले
मित्रों! सावन है, बाबा भोलेनाथ का प्रिय महीना, श्रीहरि वर्षा-चौमास के चलते, बाबाश्री को लोक का संपूर्ण चार्ज देकर, शयन पर गए हैं। और भोलेआशुतोष से जो, जो.. चाहे इस दौरान ले सकता है। वह सकल मंगलकारी अर्धनारीश्वर रूप प्रसन्न हों। मेरी सभी के लिए श्रीराधा प्रसाद की कामना है जो सभी के हृदय को अपनी रससिध्दि से प्लवित, पल्लवित, पुष्पित और फल प्रसाद से भर देती हैं वह श्रीराधा इन पंक्तियों से प्रसन्न हों।
हे राधिके! हे रस सु-रसिके!
सावन है रे...,
मेरो...
श्याम.. को, एक बार तो..
झूलन.. चढ़ा ले..।
छोटो है रे, तेरे साथ खेलन चाहतो है,
मत.., मुकर रे!
मोरो श्याम.. को एक बार तो..
झूलन.. चढ़ा ले..।
पेंग, हल्की.. मारियो रे...
ध्यान रखियो...
न.. टूट पाएं, प्रेम.. की ये,
रस्सियां..
इन पेड़ की डालन नहीं,
बाँहन.. परी रे..
हे राधिके! हे रस सु-रसिके!
सावन है रे...,
मेरो...
श्याम.. को एक बार तो..
संग.. अपने,
स्नेह से, झूलन.. चढ़ा ले..।
हुलसती.., चरमराती, हुचुकती
ये नम्र हैं रे!
देख... कैसे, लचकती.. हैं
बच्चियों सी, उमंगती हैं,
फुहारों में, धुली ये
श्याम की, सब.. सखीं हैं रे!
सावन है रे...,
मेरो...
श्याम.. को एक बार तो.. झूलन चढ़ा ले।
तूं, बड़ी.. है री!
बावरी.. तो नहीं है री...!
देख! कैसे ताकतो है,
श्याम, तुमको..
नेह भर भर, भीगे.. नयन,
रस.. टपकतो है,
प्रेम रस.. यह! देख तो...
हे राधिके...? तूं रोक... झूलो
एक बार मेरो 'बाल' को,
झूलन चढ़ा ले।
जिद न कर, तूं... सयानी है
सब.. जानती है...
श्याम को तूं समझ सच्चाे..
भूल सारे, खोट.. पिछलो
राजी.. है, तुझ सो
हाथ अपने, हाथ.. उसका
पकड़ रे!
हे राधिके! हे रस सु-रसिके!
सावन है रे...,
मेरो...
श्याम.. को, एक बार तो..
झूलन.. चढ़ा ले..।
आज की स्फुरित ताजी रचना
जय प्रकाश मिश्र
दिनांक. २१.७.२५
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