वो नहीं इस.. बार था, बारिश.. में साथ।

जीवन पर लिखी कुछ विशेष लाइने आप के आनंद हेतु प्रेषित हैं। ईश्वर इन्ह शब्दों को इनका यथेष्ट प्राप्त कराए।

याद आई, उम्र.. अपनी, 

देख.. कर पेड़ो.. को उन,

बगीचे... में नहीं थे

इस.. बार की,  बारिश.. में साथ।


लुप्त हो परिदृश्य से, 

ओझल.. हुए! 

खेलते.., कभी झेलते.. 

बगिया से इस,

ग्रीष्म, आतप, शिशिर ठंडक, 

बीच ही...,  

भागते, भीगते ता-उम्र वे....

रीझते... किसी और पर,...  

थामे.. हुए, कोई... और,  हाथ...।


तुम गलत हो प्रिय, 

बात वैसी नहीं रे! वे साधु... थे, 

रीझते थे, प्रभु पे अपने

पकड़े रहे .. दुनियां के हाथ।


सच मान मेरी..

हम सोचते हैं, समझते हैं, 

जी रहे हैं.. 

जिंदगी जो,  विश्व में इस, 

वह सत्य से अति दूर.. है, 

यह प्रभावित है, ग्रसित है,

संकुचित है...

वृत्तियों से, अनुभवों से, 

स्मृति पटल पट.. 

बदलते..., पाटल.. के साथ।


आ.. देखते हैं, क्या.. है ये...

कुछ... 

रख गए हैं, अक्षरों में, 

समेटे.,, 

शब्द.. की, इन झाड़ियों... में, 

छुपाकर, बचाकर, 

सतर.. की इन क्यारियों... में,

जतन.. से।


तो...लो, 

उसे... मैं पढ़ रहा हूँ,!  

अच्छे लगें तो, मार्क करना, 

फेंक देना, अन्यथा..., कूड़े.. के साथ।


वे लिख रहे हैं,

छोड़ सबकुछ, सीख.. लो, 

वह कला... यारों, 

खुश..! कैसे... रहें? 

अभावों में शक्ति के, संपन्नता के, 

सुखों के

स्वास्थ्य के, अपने जनों के प्यार से,

दुखी हम कैसे न हों, 

अप्रिय मिलन से, 

कष्ट से, हर व्याधि.. से

दूर कैसे हम रहें, हर भावना से 

हो सकें तो स्वार्थ से..।

यही तो इस जिंदगी का, साध्य था..

क्या मिला क्या खो गया, बेकार था।


साधना थी जिंदगी, भोगनी 

हमने बना दी

शेष अगले जनम में... 

अब बात होगी।

शेष अगले जनम में... अब बात होगी।

जय प्रकाश मिश्र

सद्यः स्फुरन् प्राप्त पंक्तियां

दिनांक २१.७.२५









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