एक आईना था, दूर रखा..
शीर्षक: एक आईना था, दूर रखा..
आ.. बैठ लो,
मेरे पास, तुम.., बस एक.. क्षण
अब क्या बचा है, पास मेरे..
कुछ नहीं..,
तुम्हे दे सकूं, मैं.. सत्व, रज, तम!
एक आभा,
टिमटिमाती... जल रही,
अवशेष.. अब!
इन अस्थियों का स्नेह लेकर..!
क्या बचा है पास मेरे..
छोड़ इन कुछ, अनुभवों... के
कुछ, नहीं..,
तुम्हे दे सकूं, मैं.. और गुरुतर!
एक आईना था, दूर रखा..
चमकता..
उस..., धूप.. में, तब...
मैं, खो.. गया था, उसी... में,
इस! जिंदगी भर...।
पास पहुंचा..,
दौड़ता..., मैं हांफता...
सीढ़ियां... थीं, उम्र... की,
दहलीज सारी.., पार.. करता
जब, आईने.. के, सामने...
मैं खड़ा था,
ठगा था, मुझे.. आइने की चमक ने!
यह देखकर मैं, भौचका था!
सच! कह.. रहा हूं...
कुछ.. नहीं था! उसके पीछे..!
डरावना एक शून्य.. था।
मैं.. दीखता था, खुद... जहां!
सच!
वहां पर..., वह..!
मैं नहीं था, एक भ्रांति.. थी...,
एक अंत था, केवल बचा, केवल बचा।
मैं, वहीं.. था, मैं, वहीं.. हूं,
मैं.. वही था, मैं वही हूं!
प्रिय! आज तक...!
इसलिए तो कह रहा हूँ
आ.. बैठ लो,
मेरे पास तुम बस, एक.. क्षण
कुछ नहीं है, पास मेरे..
तुम्हे दे सकूं, मैं.. सत्व, रज, तम!
छोड़ आया, आज सब... कुछ
दौड़ कर, मैं थक गया हूँ!
अब मिला... है
अधिकतम..!
पर.. क्या करूंगा... रख मरूंगा!
यहीं, यह सब...।
इसलिए
तो कह रहा हूं,
जिंदगी है रोज की, यह 'रोज' सी
हर दिन जिओ, और खुश रहो।
कुछ नहीं है, पास मेरे..
तुम्हे दे सकूं, मैं.. सत्व, रज, तम!
तुम सारथी हो! समय के...
यह, याद... रखो,
पार... देखो,
समय के... उस पार, देखो..!
शांतिमय, रस, विरस, रसमय
प्रभा के भी, पार.. देखो..
पारगमन!
इस प्रणाली की धार देखो!
आज से, इस पार से...
उस पार देखो..
इसलिए तो कह रहा हूँ
आ.. बैठ लो,
मेरे पास तुम बस, एक.. क्षण
कुछ नहीं है, पास मेरे..
तुम्हे दे सकूं, मैं.. सत्व, रज, तम!
जय प्रकाश मिश्र
जीवन में, 'जीवन पथ' महत्व पूर्ण आयाम है। यदि शांति, आनंद, और संयम से यह पथ दूर रह गया तो माने कि मृगमरीचिका में ही बीत गया। अतः स्वयं से अपनी छोटी सी मुलाकात नित्य ही करनी चाहिए। और दुनियां की मायावी चमक से बचना चाहिए। दर्पण सी सुंदर इस दुनियां में सब खोखला ही है। कोई आप को कीमती अनुभव ही दे सकता है और कुछ नहीं।
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