क्या सत्य को हम जानते हैं।

भाव भूमि: संसार की पहेली, हर दिन नवेली, कौन समझाए किसे, सच में अलबेली। जितनी ज्यादा संवेदना से इसे लेंगे, उतना ही परेशान होंगे! इसलिए हमेशा इसे हल्के में लें, अपना काम आराम से करें, प्रायश्चित से बचें। जिस हाल में जो मिले प्रसाद मानकर खुश हो उसे अपनाएं। क्योंकि यहां जितने लोग उतनी दुनियां। उतने विश्वास और उतने ही सत्य। इसी पर कुछ लाइने मित्रों के आनंदवर्धन के लिए प्रस्तुत हैं।

उसने..  पूछा ! 
प्यार.. से, 
यह विश्व... क्या है?  
मैने कहा...
एक, रील चलती... और क्या है? 
वास्तविक, भी है... 
थोड़ी,
समझो जहां तक, 
भाव.. दो! 
लादो जहां तक, माथ.. पे।

देख ना!  
कुछ, सरफिरे.. हैं, 
सिरफिरे.. हैं, इसी में
मस्त हैं, हर बात से,
विश्व तो यह 
एक ही सबके लिए, 
उनके लिए, 
तेरे लिए, मेरे लिए।

उसने कहा...
कोई बात... है, ये... 
इतना... सभी ही, जानते...,हैं, 
थोड़ा गहरे आओ,सत्य से 
पर्दा..उठाओ,
समझाओ थोड़ा, विस्तृत बताओ? 

मैने कहा,  क्या... 
'सत्य' को, 
तुम जानते.. हो? 
सच! बताना ! 
उसे तुम पहचानते.. हो! 
उसने कहा, 
वास्तविकता सत्य है...
जो सामने है, सत्य... है
क्या सत्य इससे, अलग.. है? 

मैने.. कहा, 
वास्तविकता, जानते.. हो,
सत्य.. 
उसको, मानते हो...
सामने.., जो.. देखते.. हो
सत्य.. उसको समझते हो! 
यह... 
गलत है, 
मित्र मेरे! सत्य.. 
उससे... अलग.. है।
क्या चाहते हो, 
समझना..., जानना.. उस सत्य को 
तो धैर्य रखो, सांस लो, 
गहरी यही पे।

सत्य, 
नैसर्गिक.. है,  रे...! 
अनुकृति नहीं, प्रतिलिपि, नहीं.. रे! 
यह, ओरिजनल.. है! एक.. है, मूल.. है, 
खुद..., अपने ही,  में।

प्रतिबिंब.. 
से, यह... दूर... है,
जो देखते.. हो, दृश्य.. में, 
नेत्र... से, मस्तिष्क... में।
जो सुन रहे हो कान में 
तुम कंपनों से,
स्पर्श कर के कह रहे हो, 
मुलायम है
अनुभूति है वह, 
अलग.. है, सबके.. लिए।

भान तेरा, 
संज्ञान तेरा, अनुभूति तेरी,
अवधारणा, हर बोध रे, 
मस्तिष्क की रचना, समझ! 
इंद्रियों की दक्षता
सब अलग हैं, एक दूसरे से..।

इसको समझ रे!  
पर सत्य तो बस एक है 
अपने लिए ! 
लोग जितने देखते हैं, सुन रहे हैं, 
छू रहे हैं, 
अलग सबकी बात रे..
नजरियों से.., इंद्रियों से, दक्षता से, 
मान्यता से, मस्तिष्क से।
सत्य संभाषण सभी का 
एक होगा
नहीं रे! 
फिर वास्तविकता कहां है! 
कहां है वह सत्य रे।
लोग जितने, सत्य उतना, 
कभी हो सकता 
नहीं रे! 
कभी हो सकता नहीं रे।
विश्व की तुम बात करना फिर कभी रे! 
फिर कभी रे! 

जय प्रकाश मिश्र






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