प्रकृति का यह.. नृत्य! सचमुच अलग है..
भाव: यह विश्व एक पहेली, पर.. कल्याण प्रद! जीवनता और अस्तित्व-वान इसकी विशेषता। काल का काला पट लपेटे, शून्य में सब डीडिंबित, संचलित, अपनी गतिलयता में व्यस्त, शून्य में अवस्थित पर चेतना पूर्ण, आनंद प्रेम और विश्वास की शक्तियों से परिचालित अदभुत है। इसी पर कुछ लाइने आपके मनोरंजन के लिए।
आ.. चल,
मिलें...,
इस चेतना से,
हम.. कहीं,
बिखरी.. हुई,
नव चंद्रिका.. सी
हर.. कहीं।
मिलें...,
इस चेतना से,
हम.. कहीं,
बिखरी.. हुई,
नव चंद्रिका.. सी
हर.. कहीं।
भाव: चेतना इस विश्व में ही नहीं,: प्रकाश सी सम्पूर्ण ब्रह्मांड में एकसार प्रसरित है। उससे अपनी चेतना को मिलाना आनंद का स्फूरन होता है। विश्व व्यापी चेतना की अवधारणा के साथ अपना अस्तित्व देखना अद्भुत अनुभव है।
नजदीक.. से,
देखें .., उसे...
भागीरथी....,
नई... एक्,
बनती.... हुईं।
भाव: ब्रह्मांडीय चेतना में जब हम अवस्थित होते हैं तो लय विलय, ध्वंस और निर्माण की स्थितियों को महसूस करते हैं जो अनिर्वचनीय अनुभव होता है।
आदमी....
एक.. चित्र है,
नेपथ्य... में,
नेपथ्य... में,
इस प्रकृति... के,
जो.. सोचता है
जो.. सोचता है
अपने... तक
बस उसके आगे...
बस उसके आगे...
कुछ... नहीं।
भाव: मानव कुछ भी अहंकार करे, पर यह परम स्वार्थी है और अपने जन्म और मृत्यु के चलते सदैव सीमित ही रहेगा।
कौन हैं हम...!
प्रकृति.. की
प्रकृति.. की
इन क्यारियों... में,
पैदा हुए, पलते हुए,
पैदा हुए, पलते हुए,
चलते हुए, थकते हुए
जरूरत भर..
सोचते..
मनोरथ भरते हुए..
प्रोग्राम भर!
एक शून्य.. से, ये.. निकले..
एक शून्य.. में. मिलते.. हुए,
बस, उससे ज्यादा
कुछ नहीं।
भाव: जीवन अपने आदि और अंत में सीमित प्रकृति की अन्य उपज से अलग नहीं। यह नियति का चेरा, नौकर ही है। क्योंकि उसने ही इसे अपनी जरूरत के लिए रचा है
सोचता हूँ,
यह.. सभी कुछ!
अंश है, उस सत्य का,
अंश है, उस सत्य का,
क्या?
जो.. चल रहा है,
पल रहा है
आदि से
इस, नियति.. के, गर्भ में,
ब्रह्मांड में।
एक सा... यह..
गीत.. गाता, प्रेम.. का,
विश्वास... का
हर एक कण को नचाता..
नाचता..
खुद, जश्न.. रचता
हृदय में, मानव मनों में।
भाव: ईश्वर या ब्रह्मांडीय परम शक्ति क्या हो सकती है जो अस्तित्ववान रह सके, जोड़ सके और स्थायित्व प्राप्त करे! वह मात्र प्रेम, विश्वास और आनंद का रेशा ही हो सकता है
आदमी की शक्ति.. क्या?
विचार.. क्या?
सब बदलता,
हर एक क्षण.. स्थिर कहां?
कुछ भी नहीं.. विश्वास इसका !
इसको पता क्या!
नाचते एक अणु के आगे,
नाचते एक अणु के आगे,
बौना है ये..
रोक दे उस नृत्य को, सपना है ये..!
प्रकृति.. का
रव.. नृत्य! सचमुच..
अलग है... हम मानवों से,
समर्थित है, नृत्य... इसका
ब्रह्मांड.. की
ब्रह्मांड.. की
उन रश्मियों.. से, शिराओं.. से
बह... रही
अस्तित्व की यह धार जिससे।
कौन है यह, आदमी!
जो.. शून्य में 'कुछ'... खलल कर दे।
कौन है यह, आदमी!
'उस..शून्य' में कुछ... खलल कर दे।
भाव: नर्तन प्रकृति का अलग है, हम मानवों से, हम स्वार्थी लोग और वह विराट सोच की। उसकी शांति में, उसकी व्यवस्था में आदमी की औकात नहीं की कोई अड़चन पैदा कर सके।
जय प्रकाश मिश्र
दिनांक: 23.7.25
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