ये दरारें हैं जिंदगी की कहां रख दूं!

भावभूमि: जीवन का यथार्थ कठिन ही नहीं कुटिल और कुत्सित भी होता है। पर बीते हुए समय कैसे भी हों अपना आवेश खो कर सामान्य हो जाते हैं। आज का युवा हररोज अपने यथार्थ से समझौता करके ही जी सकता है। लड़कर और हारकर उसे क्या मिलेगा एक अपमान और पश्चाताप! इसी पर आज के संघर्ष में पिसते हुए युवा भविष्य पर कुछ लाइने, आपके चिंतनार्थ प्रेषित हैं। आनंद भी आप ले और क्या कहूं।

इस जिंदगी की, सलवटों... को, 
जैसी भी हैं, आज.. जब,
इन्हें, देखता.. हूँ, 
मूर्ति.. हैं, 
बेजान.. हैं, अब, 
सच में.. सब...
छांव में, आराम में, 
शांति में, आनंद में इस... बैठ कर! 
सोचता... हूं! 
सच! कश्मकश.. थी, 
जिंदगी यह...
युद्ध... थी, संघर्ष थी, बाहर च भीतर।

जीतना.., जरूरी.. था, 
किस.. तरह, तब..! 
यद्यपि.. अकेला , 
हमेशा अभिमन्यु था वह..
रनांगण में लड़ रहा
व्यूह में..., 
मैं जानता था, बात यह! 
अच्छी तरह...।
पर.... 
आज जब.. 
इस जिंदगी की सलवटों... को, 
देखता.. हूं, 
मूर्ति.. सी, बेजान..हैं,  सब! 
बेजान..हैं,  सब! 

आज भी है, युद्ध.., वह... 
रनांगण में चल रहा, ठीक वैसा
आसां... नहीं है, जीतना..
मैं..., जानता.. हूँ! 
सच.. कहूं तो, दौड़ से 
बाहर.. हूं, मैं...
पर सुन रहा हूँ !  
ध्यान से,
अवधान लेकर! 
बंद रहकर...
आदतों में, जरूरतों में, 
भावना के,  तलपटों पर.. 
गूंजती आवाज यह! 
चारों तरफ...
अंतर्मनों के ज्वार.. की
असमंजसों की, नौकरी के चाह की
जिंदगी के, न्यूनतम सी मांग की..।

क्या करें वे? 
कह... रहे हैं, प्रार्थित हैं
मुंह... खोलते हैं, आप से.., 
हमसे..
नियोजित.. करा दो 
हमको कहीं.. भी।
खाली.. हैं हम, बर्बाद हैं... हम! 
जिंदगी की नाव.. पर, हम.., 
या नाव.. है, ये.. जिंदगी..,
चुप.., सोचते.. हम।
पर! 
जिंदगी की सलवटों... को, 
देखता.. हूं, आज जब
मूर्ति.. सी,  
बेजान..हैं सब! 

जय प्रकाश मिश्र


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