टेंपरेचर बढ़ा है.

टेंपरेचर बढ़ा है

टेम्परेचर, बढ़ा.. है, 
कुछ.. तो..., हुआ... है,
मुझे लग रहा! 
आदमी... 
अब, आदमी... से 
मांरली.., ऊपर... हुआ है।

कुछ.. खौलता है! 
सब के भीतर.., जाने क्या! 
सोचता.. हूं, क्या आदमी यह! 
आदमी सा बन रहा है..
या.., और भी.. बदतर... हुआ है।

सब... और अच्छा, दीखता.. है, 
सामने..,
सच! शहर.. में,
गांव.. में, हर गली.. में, 
हर जगह.. लेकिन 
यह... ढूंढता है, 
उसी को 
यू ट्यूब में, रील में, फिर न्यूज में।
इस लिए तो कह.. रहा हूं
टेम्परेचर.., बढ़ा.. है, 
कुछ.. तो..., हुआ... है।

देखता..!  
ये... है, नहीं... 
सामने... अपने यहीं.., 
अवघात.. कितने
घट.. रहे हैं, नित्य ही... 
सब आम.. हैं, कह.. कोसता है,
सोचकर! 
मुंह.. मोड़ता है! 
चुपचाप यह, वापस.. हुआ है। 
अभी ही... वो! समस्या 
या प्रॉब्लम,
स्क्रीन पर दिख जाए गर ... 
चल... रही, ट्रॉल होती
देख! उस रंगी.. खबर 
को...
यह किस तरह, पागल... हुआ है।
टेम्परेचर, बढ़ा.. है, 
कुछ.. तो..., हुआ... है।

उस, रो... रही, 
फरियाद... करती, 
छोड़ असली, नकली से नकली 
स्क्रीन पर बहती... हुई,
निकलती... 
उन जलकणों सी, आंसुओं.. को
देखकर विह्वल.. हुआ है।
देख.. कैसे! आज ये पागल हुआ है। 
टेम्परेचर, बढ़ा.. है, 
कुछ.. तो..., हुआ... है।

यह.. क्या हुआ है? 
चमक इसको चाहिए, हर चीज में अब! 
वास्तविकता छोड़ सारी... 
जमीं पर! 
रिपोर्टरों की, अदा का 
कायल हुआ है।
टेम्परेचर, बढ़ा.. है, 
कुछ.. तो..., हुआ... है।

जय प्रकाश मिश्र

आज हम वर्चुअल दुनियां को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। वास्तविक समस्या और घटनाएं, अपराध अपने सामने होता देख हम चुप रहते हैं। उसे आम मानते हैं। उसके प्रति दायित्व न निभा कर रील या तस्वीर लेने लगते हैं। हम दिनोदिन नीचे ही गिर रहे हैं।







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