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Showing posts from June, 2025

एक नाव थी, यह जिंदगी,

भाव भूमि: मित्रों! जीवन रंगीन गुब्बारे सा, प्रफुल्लित, विकसित, वृहद आकार लेता, आकर्षक, मनरंजनी, ऊपर उठता, दिखता है। पर एक दिन वय प्राप्त अवस्था में वायु निकलने से शनैह सिमटता अपने औकात में आता ही है। सारे संबंध, संपत्तियां, उपलब्धियां, पद, और ये दुकौड़ी कुर्सियां बेकार, अर्थहीन हो जाती हैं। तब अपने से अपनी मुलाकात होती है। एक दिन जब पंछी उड़ नहीं सकता, उसे तब उड़ाया भी नहीं जा सकता। इसी पर आप पढ़ें और आनंद लें। एक नाव... थी, यह जिंदगी,  बहती.. रही, है... आज तक.. भ्रम था मुझे, मैं.. खे रहा हूँ  इसे.. मंजिलों के, घाट तक..। सलीके.. से, कुशलता से  बचाता..., हर एक पत्थर अज्ञान.. था, वह..,  आज.. आया, समझ.. में पतवार, मेरे... पकड़ में,  थी.. ही नहीं.. एक पल, को.. आजतक..। एक.. संतुलन था,  नियति.. थी, नियति की कुछ.. चाहना थी,  समय के संग.. घट.. रही थी, किरदार था मैं,  पतवार..  ढोता..,  प्रिय! इससे ज्यादा कुछ.. नहीं!   यह... किनारों पर, थी कभी.., कभी.. थी, मजधार में  हवाओ.. का,  और  थोड़ा मीत.. का  साथ  पा.. तिरती...

बहुत पूछा उनसे मैने, क्या था वो,

मैं चुक.., चुका हूं! जानता हूं बात को इस... इसलिए,  दे रहा हूं, राज... कुछ!  उत्कृष्टतम..  निज.. जिंदगी का। रहस्य को उस,  सिर्फ तेरे ही लिए,  मैं खोलता हूं..,  बैन है, यह समाज में इस..,   जाने न कबसे.., बस इसलिए...  यह, व्यवस्था सब चल सके,  कर्म.. से, पैरों.. पे खुद..,  सतत.. आगे..,  और आगे.. बढ़ सके। अलकापुरी...  एक.. स्वर्ण.. नगरी!  चमचम.. चमकती, मनोहर!  सब जानते हैं, कुबेर.. की।  पर कैसे बनी थी?  कैसे बनी थी, स्वर्ण... लंका?   स्वर्ण की,  यह, किस तरह संभव हुईं थी!   क्या कभी, सोचा!  किसी ने.... वह राज है, रहस्य है,  एक क्रिया है जानकारी..., सच.. समझ है,  बस, उस समय,  उन सभी.. को, अच्छी तरह थी। शायद, इसे कोई देख ले..  जो तीव्र हो,  बुद्धि से, सोच ले,  भाग्य बल से  ही, वो... अपने  प्राप्त कर ले. बिल्कुल वही.. जो उस समय था.. इस लिए, मैं.. लिख रहा हूं कोइ पढ़.. ले, समझ.. ले,  पूर्ण.. कर ले,  टास्क.. को इस,  जो स्वयं हल ह...

वो कौन था, रहता यहां पर

आज का दर्द: जीवन नदी सा बहाव ही है, वर्षा काल के यौवन में हहकारता, दबोचता, किनारे तोड़ता, चुनौती देता, भयावह होता, दौड़ता भागता रहता है। जीवन की ग्रीष्म में सूखी नदी सा वृद्ध हो अन्यान्य बीमारियों से लाइलाज, हांफता, रुकता, करुण पुकार करता आगे बढ़ता है। सभी इससे गुजरते ही हैं। जीवन की, इस दुर्दमनीय अवस्था को मैने बहुत पास से देखा है। आप के लिए शब्दों में पिरोया है आप पढ़ें और आनंद लें।  वो  कौन था,  रहता यहां था, इतने दिनों... तक,  गुलज़ार थी, ये जगह कैसी!  उसके ही दम पर!  यह बोलती थी,  अरे यह!   कैसी मुखर थी,  आबाद थी, किस तरह, रंग.. कैसे घोलती,  छतनार.. थी। शीतल.. बहुत थी,  आबरू-ए-चमन की, आधार थी,  आधार थी यह.., हम सभी की। उड़ गए पंछी न जाने  अरे! कितने... घोंसला अपना बनाए  इसके.. दम पर,  यह शख्सियत थी,  उस दौर की, दौरेजहां.. की,  मैं,  जानता... हूँ,  इतने... दिनों से..., अच्छी तरह । कुछ कह रही, दीवार यह,  उत्सुक है क्या..?  संदेश... उसका...  मौन... में ही, मुझे.. देगी..। ...

फकीरी! तेरी चाह.. है, तेरे लिए..स्वीकार है ।

भाव: आज समाज में, नव विवाहित जोड़ों के बीच जो अनुसोची घटनाएं घट रही हैं, उन्हें देख दिल दुखता है, हम किसी भी पक्ष के हों। प्रेम और समर्पण की जगह वैर भाव और नृशंस हत्याएं हुई हैं, जो सभ्य समाज पर काला धब्बा हैं। इसी पर कुछ लाइने आप के लिए प्रस्तुत हैं, पढ़ें, आप आनंद लें। एक दर्द है दिल में मेरे,        जब देखता हूं हाल ये,            खून करता है कोई, जब                 सनम का, खुद चाकुओं से। हाथों की मेहदी छूट पाती     अरे! उससे... भी.. पहले,         रक्त कैसा लाल.. बिखरा            देख तो कपड़ों.. पे उसके। दर्द.. ही जब नहीं है... मेरे... लिए,  अब, दिल... में तेरे... इसके लिए, मैं क्या.. करूंगा!  साथ तेरे उड़.. भी लूंगा,  कुछ समय,  इन जंगलों में बे...सबब, सुनसान से तूं... ही बता, मैं.. इससे आगे.  क्या.. करूंगा। पास.. रह तूं,  दूर.. जा.. यह तूं समझ!  पर  मैं.. पतिंगा,  तेरी.. शान.. में, अब.. जल.....

छुप रहा सौंदर्य क्यों इन, कुनमुनाते अंग में

भाव: सुंदरता का यदि यथार्थ विश्लेषण किया जाय तो यह, विविध रंगों, तूलिका, और चित्रकार के मन का एक बाह्य प्रदर्शन मात्र ही है। लेकिन विधाता की इन सुंदर कृतियों में इनसे अलग भी बहुत कुछ है जिसमें हम अंततः बंध जाते हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें। छुप रहा सौंदर्य क्यों इन,  कुनमुनाते अंग में  अंग-रस बन,  यौवनों..  में, रूप.. में  पूरी..  तरह , यह  उतरता.. मुखर होता, क्यों नहीं है?  जब जब तुम्हें मैं देखता हूं!    पास से, यथार्थ में रेखाएं हो तुम,  रंगीन.. कितनी..., एक संग.. खिंचती हुई, किसी तूलिका की और तो इससे अलग, सच... कह रहा हूँ,  इस रूप में, कुछ भी नहीं है। कुछ भी नहीं है?  लेकिन ये क्या  है..!  तरल हो तुम, मोम का पुतला कोई.. हो पिघलता, लेकर सरल मन, आंसुओं में भीगता पाता तुम्हे हूँ!  छू..  तुम्हे,  जब हाथ से  मैं देखता हूं, ख्वाब हो तुम दूर से..  भ्रम.. हो कोई,  वास्तविकता कुछ नहीं तुम। अपने हृदय से पूछता हूँ मत तिरो,  सागर में इस, गहरा बहुत है!  सन्तरण..,  यह...

आज की जनरेशन

आज की जनरेशन वो.. हर वक्त,  हर तरह, सावधान थे,  मै समझता हूं शायद, इसीलिए ...   अंदर से, ज्यादा परेशान…थे। उन्होंने चुना था  अपने लिए, सदा.. अच्छे से अच्छा..  आधुनिकता.., उन्नत शिखर..,  अद्वितीय चम चम चमकतीं  कारें..और घर..। । मैं, मानता हूं   पराक्रम के बल पर,  आधुनिकतम मशीनों के  सुपरतम.. तकनीकों पर चढ़ कर, धोखे से.. चतुराई से  अच्छों को, लोगों को,  प्रकृति को, छल कर...,  वजह बे-वजह  सामने से हटाकर… नीचे... गिरा कर,  दूसरे, सभी के, मंसूबे,  मीनारें, महराबें... ढहाकर...। हमेशा..  आगे बढ़ना..  शीर्ष पर.. रहना… अधिकतम संसाधनों का  दुरुपयोग की सीमां तक उपभोग करना, इसके लिए, तोड़, सारी रोक, टोंक .. अंधे सा अंधाधुंध,  राक्षसी दोहन करना, आम है  इनके लिए । मुक्त जीवन.. चीजें! जो समयपार हों,  बे मौसम हों,  उनकी हर समय, हर जगह भरमार हो!  इच्छानुसार भोग,  नहीं जीवन में कोई सुंदर  स्वाभाविक योग। यही तो था उनका  आज का  सभ्य जीवन! और क्या था?  न...

प्लीज़ इसको मत सताओ।

भाव: नियति नटी, जगदम्बा रूप प्रकृति का हाव भाव, कार्य और इसकी योजनाएं हमारी अपेक्षाओं से अलग, संपूर्ण विश्व समुदाय के व्यापक हित के दृष्टिगत होती हैं। प्रकृति.. का नर्तन, विलग.. है हर.. किसी से, नाचती.. है  पुष्प.. में, यह पत्तियों.. में, एक सी..ही, नृत्य करती  बादलों.. में, बनो.. में। प्रकृति.. का नर्तन, विलग.. है हर.. किसी से। भाव: इन प्रकृति देवि के सभी उपक्रमों में, कार्य में अद्भुत सौंदर्य, सुख, रस, नवीनता, प्रसन्नता निहित रहती है। इसका कार्य मानव के स्वार्थ, लालच आदि से मुक्त सभी जन सामान्य के लिए होता है। आगाज़ कैसा !   अंधेरों... के, बीच... में!  बरसती उन बदलियों के मस्तकों पे सूर्य.. की किरनो... सरीखा बिजलियों का चम.. चम... उजाला !    सुरमई... सी शाम,  में  दूर..उतनी  दूर का,  छिपता... शिवाला..। भाव: सौंदर्य और प्रसन्नता इस देवि प्रकृति के हर सीवन में अनुस्यूत रहता है। इसके हर कदम में एक अलग ही लय ताल जो अंतर को अनन्य प्रशांति देती है आप महसूस कर सकते हैं। सुनहरी सी, सुबह... ये,  छिटकती..  मधु-रश्मियां.., बुन रही ...

यशोदा.., खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो रे !

भाव: जानने वाले जानते हैं, अपने श्रीकान्हा और श्रीराधाजी में कभी द्वैत संभव ही नहीं, अद्वैत का इनसे सुंदर उदाहरण भी नहीं। नटखट नीलवर्ण श्याम और अनारदाने सी लालिम-स्वर्ण वर्णा राधा दोनों में झलक एक ही है। अनार के दाने पानी पाते ही नीलाभ हो जाते हैं और नीलकमल में गुलाबीपन किनारों से झांकता रहता है। इनका ऐक्य ऐसा ही है। आप इन लाइनों में यशोदा से कान्हा के उलाहना और उसी में भीतर छुपे प्रेम को अनुभव कर आनंद लें। अरी! ओ.. यशोदा, खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो, रे!  कैसे कहूं, उन्ह.. चोर,  मैं.. रे..!  अरि..! उन्हन...  तौ...  चोर... सौं, अति.. बावरो.. रे, यशोदा..,  खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो रे!  नाम..  धरो.. है,  कुंज... बिहारी.. झूलत... कुंजन में, पट डारी,  राधा... संग, संखियन.. के,   सुन री..!  झूलत.., इत डारी.., उत... डारी, कौतुक..  करत..,  हेरि...!   सुन.. कईसो..,  मन.. ललचत.. है, मेरो... यशोदा..,  खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो रे !  एक.. दिन, देखी.., श्याम.. तेरो.. रे! बंशीवट की छइयां.. ग्वाल सखा...

मैं, सोचता.. था, कहीं..कोई "ईश" होगा,

परिचय: आज दुनियां, बुद्ध छोड़ लोग युद्ध आमुख है। "विनाश के भय" से डरी, आपसी सद्भाव खोती, दुनियां बारूदी सांस को मजबूर हैं। सोचता हूं क्या अच्छी और सच्ची दुनियां, लोगों और देशों का मनोबल तोड़ कर बनेगी, आपसी विश्वास से नहीं यह भीष्म प्रश्न आ पड़ा है। लोगों का सौदा लोगों ने किया है। मानव राज में, मानव आज, मात्र मानव से सबसे ज्यादा दुखी है। लगता है नियति हार रही  है, धरती पर विनाश प्रिय विज्ञान का कब्जा हो रहा है। चन्द पंक्तियां आप पढ़े, आनंद लें। नियति के बड़े खेल हम सभी आगे देखेंगे ही।  रण.. ही रहेगा,  क्या यहां..  जीवन सदा..,  यह श्राप है?   नक्षत्र के, इन.. वासियों को  प्राणियों.. को। और.. आगे,  परस्पर...  सद्भाव,  क्या?  कभी.. भी..,  न.. होगा!  तांडव!  इन मूर्खों...का,  यूं.. हीं...सदा, चलता रहेगा!  अभी... और आगे..  आखिर, ये.. कब.. तक!  धरा पर, ऐसे.. चलेगा। रोक दे, ये युद्ध, सारा...  धरा पर, इस...  क्या कहीं,  एक.. कोई, वीर.. होगा, शांत कर दे,  विश्व की इस आग को, धधकती, जल...

उनके लिए मैं रो रहा हूँ।

परि परिचय: आपके लिए जीवन की धूप छैयां को व्यंग में ढाल थोड़े शब्दों में समेटा है, बहुत सावधान आदमी जीवन में, जीवन से, दूर ही रह जाता है और उसकी सालों की अवधि, लम्हों में गुजर जाती है। जिंदगी हवाओं सी फिसल जाती है। धूप थी, कड़ी थी,  और उमस भी तो, अधिक.. थी, खेलते... बच्चे वहीं, अंजान थे इन सभी... से,  कुछ बड़े  थे...  "लोग",  शिकायत... उनको, बहुत थी..  इस बार सी "उमस-गर्मी"  किसी ने  देखी नहीं थी। मस्त बच्चे, दौड़ते, हल्ला मचाते, कूदते खेलते, फुटबॉल, किकेट  झगड़ते, कुछ पिनकते.. लूटते, अरे!  मजे थे, वे  समझ तो, अनभिज्ञ थे हालात से, दुनियां के इस..  बौउझार से,  समस्या.. से,  हम.. दुखी थे,  सच में, खुद  के.. स्वास्थ्य... से,  औलाद.. से,  पढ़ते नहीं थे, स्थिति से, कंट्रोल से.. बाहर हुआ, सब जा रहा था,  महीनों से, साल से, युद्ध से, जय पराजय से,  बारूद से, मिसाइलों, राकेटों, बम धमाकों से। क्या कहें इस जिंदगी को ढूंढने में बीत गी..., एक दिन की जिंदगी थी लम्हों... ही में, बीत.. गी। पग दो:  पग ...

एक ही चित पावनी, राधा है वो।

भाव: जन्म के साथ मानव शरीर में हमारी चेतना राधा रूप बन अंतस में उतरती है, जिससे जीव भाव और मैं पन आता है। यह श्रीकृष्ण पद से आती है और सम्पूर्ण जीवन उसी की तलाश में लगी रहती है। जब जब उनके ध्यान में रहती है इसे विशिष्ट सुख शांति अनुभव होती है। इन अनंत का ध्यान, अवगाहन, पूजन, उसी में आत्म का समर्पण अपनी संस्कृति का मुख्य अंग रहा है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें। एक ही राधा है री!  जो धार बनकर उतरती है..  उभरती... है जेहन में, हर जीव के बार... पहली,  श्रीकृष्ण.. के, श्री.. चरण रज़.. से। हर जीव.. में, हर इंद्रियों.. को जोड़ती.. यह,  चेतना से, अनुभूति.. से,  व्यवहार.. से इस अखिल जग में। चेतना का रूप ले,  काया में सबकी, बिहरती है, प्रेम करती है,  मनों.. में, हर एक मन से। आज तक.. मैं जानता हूँ,  दूसरी.. कोई, नहीं है जोड़ दे,  तन, मिट्टियों का, चेतना से श्रीकृष्ण के बृजधाम से..। तूं समझ इसको,  मान इसको, प्यार कर इस राधिका से,  चेतना..., तेरी ही.. हैं.., ये  तेरे साथ ही रहती हमेशा निर्देश करती, रास्तों का,  मार्गों का, ...

हे, सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ,

भाव: जीवन क्या है, हम कुछ भी कहें एक नदी सा समय की कठिन चट्टानों के ऊपर बहता, हवाओ पर चढ़ा, ऋतुओं के स्वाद चखता, सौंदर्य, सुख, दुख, पीड़ा, वेदना के धागों में खुद को बुनता, द्वंद के कुहासों में विभ्रमित होता आगे बढ़ता है। इसी में प्रेम, प्यार, राग, अपनत्व के उत्पाद इसे पार्श्व में छूते चलते हैं, उनमें फंसता, टूटता, बिरह पाता, आनंद लेता आगे बढ़ता है। इसी पर कुछ लाइने आप पढ़ें और आनंद लें। हे, सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ, पास.. आओ, मिल.. तो लूं!  जरा... ठीक से, गहराइयों में उतरता हे! अमूर्तनी, हे! अव-व्यया  नीहार.. तो, लूं। नजदीक.. से  बारीकियां... ले, संजीदगी से  भरे दिल, एक... अक्श तेरा  स्मृति पटल के व्योम पर,  झिलमिलाता,  हीरक कणों सा, उतार तो लूं..!  हे, सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ, पास.. आओ, मिल.. तो लूं!  चलते.. चलते..., मानस... पटल पे,  चाहता... हूँ, छवि ये तेरी, विस्तृता..., अव्याहता..  प्रसरा, शरा, चल- चपलिनी, इव कन्दुका   निरंजनी... मन रंजनी यह.., छाप... तेरी  आदतों में ढाल लूं, उतार.. लूं!   हे, सुर...

री, जानकी...! क्यों, देखती है, मुग्ध हो!

भाव: श्री रामजानकी, जब एक में लय हो, हमें एक ही विग्रह रूप दिखते हैं, तो हम पराभाव स्थिति में होते हैं। या कहें जब हम सच में, प्रेम के पवित्र क्षेत्र, संपूर्ण वासना मुक्त स्थिति में होते हैं तो, हर द्वैत  समाप्त हो जाता है। उस समय अनुभूति वास्तविक और सच्ची अनुभूत होती है। सच्ची चाह भौतिक सामर्थ्य को पराभूत कर मनःस्थिति को वास्तविकता के आवरण में रख लेती है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें। री, जानकी...!   क्यों, देखती है, मुग्ध हो!  इस तरह..! तूं... मुदित.. हो, भागते...नीलाभ.. द्युति..,  इन.. बादलों को,  इस तरह.. से..!  नीला.. सरोरुह, पूर्ण.. विकसित.. एक.. मन.. का,   इंदीवर... ही, चुन.. ले, हाथ से, निज..,  चल... तुझे...,अब छूट है,  अयि, अरी!   ये... हाथ... तूं...  जिस.. पर, भी... रख.. दे। चकित थी,  सीता... सलोनी..  देखती..., उस रूप...,  को..  कैसा, खिला था!  लग रहा था,  देखता.. सा,   दृष्टि...  उसकी.., जोहता...सा, बाट उसकी सैलाब में,  उसको वहां,  कब से पड़ा था। ...