प्लीज़ इसको मत सताओ।
भाव: नियति नटी, जगदम्बा रूप प्रकृति का हाव भाव, कार्य और इसकी योजनाएं हमारी अपेक्षाओं से अलग, संपूर्ण विश्व समुदाय के व्यापक हित के दृष्टिगत होती हैं।
प्रकृति.. का नर्तन, विलग.. है
हर.. किसी से,
नाचती.. है
पुष्प.. में, यह पत्तियों.. में,
एक सी..ही, नृत्य करती
बादलों.. में, बनो.. में।
प्रकृति.. का नर्तन, विलग.. है
हर.. किसी से।
भाव: इन प्रकृति देवि के सभी उपक्रमों में, कार्य में अद्भुत सौंदर्य, सुख, रस, नवीनता, प्रसन्नता निहित रहती है। इसका कार्य मानव के स्वार्थ, लालच आदि से मुक्त सभी जन सामान्य के लिए होता है।
आगाज़ कैसा !
अंधेरों... के, बीच... में!
बरसती उन बदलियों के मस्तकों पे
सूर्य.. की किरनो... सरीखा
बिजलियों का
चम.. चम... उजाला !
सुरमई... सी शाम, में
दूर..उतनी
दूर का, छिपता... शिवाला..।
भाव: सौंदर्य और प्रसन्नता इस देवि प्रकृति के हर सीवन में अनुस्यूत रहता है। इसके हर कदम में एक अलग ही लय ताल जो अंतर को अनन्य प्रशांति देती है आप महसूस कर सकते हैं।
सुनहरी सी, सुबह... ये,
छिटकती.. मधु-रश्मियां..,
बुन रही हों, जाल सुंदर...
फंस रही हों तितलियां...।
हवाओं में उड़ रहीं,
सुदूर ऊपर...
गगन में, नन्हीं वो चिड़ियां..,
पंख फैलाए.. विचरतीं गगन में
बनातीं..हों, मगन.. हो,
सोच से भी और सुंदर अवलि..याँ।
भाव: नेचर में हर फिसलन में, हर धड़कन में क्या रिफ्रेसमेंट छुपा है आइए देखें। शाम के धुंधलके में आकाश में छोटी छोटी चिड़ियां कतार में वी शेप में उड़ती कितनी सुंदर लगती हैं।
देख तो उन फुदकती
चुप चुप छुपी,!
कदम्बों.. के कुंज में,
सहमी हुईं,
पत्तियों के बीच में, बैठी हुई
गिल..हररियां।
क्या है ये...!
नर्तन नहीं है प्रकृति का!
तो और क्या है? तुम ही बताओ!
भाव: प्रकृति के हर प्राणी में कितनी चुहल, प्रेजेंटनेस, चिल्हक़ और शर्मिलापन होता है।
आ चलो तुम्हे और सुंदर
भव्य इसका, सुर सुनाएं।
आओ जरा हम बैठ जाएं
ताल के इस किनारे पर!
लय सुनो!
ध्यान को स्पंद पर, हल्का लगाओ।
गिरती हुई, उठती हुई, इस लहर को
धीमे... सुनो,
नजर अपनी, पानी से ऊपर..
कूदती.. इठल करती
मछलियों पर भी... लगाओ
नृत्य.. देखो, मचल.. जाओ
सागर.. है ये, पास.. आओ
प्रेम का स्नेह का,
गले से इसको लगाओ।
प्रकृति को सुंदर बनाओ
प्लीज़ इसको मत सताओ।
जय प्रकाश मिश्र
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