मैं, सोचता.. था, कहीं..कोई "ईश" होगा,

परिचय: आज दुनियां, बुद्ध छोड़ लोग युद्ध आमुख है। "विनाश के भय" से डरी, आपसी सद्भाव खोती, दुनियां बारूदी सांस को मजबूर हैं। सोचता हूं क्या अच्छी और सच्ची दुनियां, लोगों और देशों का मनोबल तोड़ कर बनेगी, आपसी विश्वास से नहीं यह भीष्म प्रश्न आ पड़ा है। लोगों का सौदा लोगों ने किया है। मानव राज में, मानव आज, मात्र मानव से सबसे ज्यादा दुखी है। लगता है नियति हार रही  है, धरती पर विनाश प्रिय विज्ञान का कब्जा हो रहा है। चन्द पंक्तियां आप पढ़े, आनंद लें। नियति के बड़े खेल हम सभी आगे देखेंगे ही। 

रण.. ही रहेगा, 
क्या यहां.. 
जीवन सदा.., 
यह श्राप है?  
नक्षत्र के, इन.. वासियों को 
प्राणियों.. को।
और.. आगे, परस्पर... 
सद्भाव, क्या? 
कभी.. भी.., न.. होगा! 

तांडव! 
इन मूर्खों...का, 
यूं.. हीं...सदा, चलता रहेगा! 
अभी... और आगे.. 
आखिर, ये.. कब.. तक! 
धरा पर, ऐसे.. चलेगा।

रोक दे, ये युद्ध, सारा... 
धरा पर, इस... 
क्या कहीं, 
एक.. कोई, वीर.. होगा,
शांत कर दे, 
विश्व की इस आग को,
धधकती, जलाती, निर्दोष से
उस आदमी को
प्रकृति को
क्या कहीं कोई दीप होगा। 

सोचता... था, बहुत पहले
कहीं..कोई, 
एक..ऐसा "ईश" होगा,
रोक देगा, 
प्रार्थना... मेरी सुनेगा! 
आदमी को त्राण देगा।

नियंता.. है, नियति है, 
इस भूमि.. पर, मैने सुना है
पर है कहां ?  
इन बादलों के पार... 
देखा! है नहीं..! 
क्या..., देख.. पाऊंगा उसे..! मैं 
और आगे.., और गहरे..! 
बिल्कुल, नहीं... 
मैं जानता हूँ, वहां भी, 
दूर उस स्पेस... में भी,
इन दानवों... का राज होगा।

नाचते, परिग्रह उपग्रह... 
हैं.. वहां, 
उस... ऊंचाई.. पर, 
देखते.. हैं,
घर मेरा.., करतब मेरा,  
हरकत.. मेरी, 
सब कुछ मेरा...
रात.. दिन.., हर एक पल..! 
तुम्हे क्या सुनाऊं! 
नग्न है!  यह धरा, अब..! 
उन दृष्टियों.. से
कुछ नहीं है दूर.. उनसे, अरे.. अब! 

इस लिए 
मैं, कह रहा हूं...
चल छोड़, अब ये छांव.. 
आंचल..की, खड़ा.. हो, पंक्तियों.. में, 
ज्ञान के विज्ञान के, 
धरातल पे, साथ इनके, 
तौल खुद को.. तौल उनको..., 
हैं कहां  
वो..
आगे.. बढ़ तो..
कठिन है क्या... समझ इनसे..
पांव तो रख.. मान मेरी
रास्ता बन जाएगा, 
तूं एक पग.. विश्वास.. से, 
निज... आगे रख तो।

कुछ कर अलग  , तूं.. इन सभी से
विध्वंश से तूं मोड इनको,
युद्ध से तूं मोड इनको,
संसार का मंगल तुम्हीं से।
इस संसार का मंगल तुम्हीं से।

जय प्रकाश मिश्र


Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!