री, जानकी...! क्यों, देखती है, मुग्ध हो!

भाव: श्री रामजानकी, जब एक में लय हो, हमें एक ही विग्रह रूप दिखते हैं, तो हम पराभाव स्थिति में होते हैं। या कहें जब हम सच में, प्रेम के पवित्र क्षेत्र, संपूर्ण वासना मुक्त स्थिति में होते हैं तो, हर द्वैत  समाप्त हो जाता है। उस समय अनुभूति वास्तविक और सच्ची अनुभूत होती है। सच्ची चाह भौतिक सामर्थ्य को पराभूत कर मनःस्थिति को वास्तविकता के आवरण में रख लेती है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

री, जानकी...!  

क्यों, देखती है, मुग्ध हो! 

इस तरह..! तूं... मुदित.. हो,

भागते...नीलाभ.. द्युति.., 

इन.. बादलों को, इस तरह.. से..! 


नीला.. सरोरुह, पूर्ण.. विकसित..

एक.. मन.. का,  

इंदीवर... ही, चुन.. ले,

हाथ से, निज.., 

चल... तुझे...,अब छूट है, 

अयि, अरी!  ये... हाथ... तूं... 

जिस.. पर, भी... रख.. दे।


चकित थी, 

सीता... सलोनी.. 

देखती..., उस रूप...,  को.. 

कैसा, खिला था!  लग रहा था, 

देखता.. सा,  दृष्टि... उसकी..,

जोहता...सा, बाट उसकी

सैलाब में, 

उसको वहां, कब से पड़ा था।

री, जानकी...!  

क्यों, देखती है, मुग्ध हो! 

नीलाभ द्युति, मुझ... पुष्प को, 

वह पूछता था? 


समेटता..., वह..

चेतना.., उस, जानकी की, 

अपने भीतर..., पुष्प था, 

या, वही... 

व्यक्तित्व था, प्रभु राम का

समोता, संसार.., माता जानकी का

शांति.., वैभव, 

अभिरामता.. लेकर खड़ा था।


अविचल.. खड़ी सीता, 

वहीं पर, जम.. गई थीं।

वस्तु हो नारी कोई, 

वह..., लग रहीं थीं

एकलय, एक् रस बनी, 

वह, बह.. रही थीं

श्री जानकी अब अलग न थी

जानकीश्रीराम विग्रह बन गईं थीं।

भाव: प्रेम सदा दो को एक करता है, मतैक्य करता है, हर स्वार्थ समाप्त करता है, आनंद बढ़ाता है।

जय प्रकाश मिश्र





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