एक नाव थी, यह जिंदगी,
भाव भूमि: मित्रों! जीवन रंगीन गुब्बारे सा, प्रफुल्लित, विकसित, वृहद आकार लेता, आकर्षक, मनरंजनी, ऊपर उठता, दिखता है। पर एक दिन वय प्राप्त अवस्था में वायु निकलने से शनैह सिमटता अपने औकात में आता ही है। सारे संबंध, संपत्तियां, उपलब्धियां, पद, और ये दुकौड़ी कुर्सियां बेकार, अर्थहीन हो जाती हैं। तब अपने से अपनी मुलाकात होती है। एक दिन जब पंछी उड़ नहीं सकता, उसे तब उड़ाया भी नहीं जा सकता। इसी पर आप पढ़ें और आनंद लें।
एक नाव... थी, यह जिंदगी,
बहती.. रही, है... आज तक..
भ्रम था मुझे, मैं.. खे रहा हूँ
इसे.. मंजिलों के, घाट तक..।
सलीके.. से, कुशलता से
बचाता..., हर एक पत्थर
अज्ञान.. था, वह..,
आज.. आया, समझ.. में
पतवार, मेरे... पकड़ में,
थी.. ही नहीं..
एक पल, को.. आजतक..।
एक.. संतुलन था,
नियति.. थी,
नियति की कुछ.. चाहना थी,
समय के संग.. घट.. रही थी,
किरदार था मैं,
पतवार..
ढोता..,
प्रिय! इससे ज्यादा कुछ.. नहीं!
यह... किनारों पर, थी कभी..,
कभी.. थी, मजधार में
हवाओ.. का,
और
थोड़ा मीत.. का
साथ पा.. तिरती रही
बहती रही है, आज तक।
सूनी ही थी, ये जिंदगी
सच कह रहा हूं,
एक तरह!
तेरे लिए रंगीन थी, मैं जानता हूं!
पर! वो... रंग,
इसके.. कहां... थे?
समय के पर*, पर.. लगे थे,
उड़ गए हैं आज, कैसे
दूर हैं वे... देख तो!
अगर सच थे..
तो, जरा
एकबार उनको खोल दे।
जिंदगी की नाव
अब यदि सच कहूं तो
तैरती कुछ लकड़ियां हैं,
शेष.. अब,
वो भी बहुत थोड़ी।
बस, एक ढांचा हड्डियों का
ही बचा है.
उससे भी कम
इससे आगे.. क्या लिखूं
मैं तुम्हे, तुम जानते हो, मेरा.. सब।
पर बह रही है, क्षीण ही हो
आज भी
रसीली सी धार एक
कहीं भीतर!
साथ पा, इन बरसती, टपकती
स्पर्श करती,
शीतली सी बूंद का
अन्तस में मेरे, चुहल करती
फिर रही है।
समय है सब! आदमी क्या?
आदमी की जिंदगी क्या?
नाव क्या, तिरना भी क्या,
पानी भी क्या, झरना भी क्या
आकाश में ये उमड़ते, बादल भी क्या!
चमकती, ये बिजलियां क्या
अरे! सारी शक्तियां क्या!
कुछ नहीं हैं..
शांति हैं सब, शून्य में,
प्रिय! एक दिन।
शून्य है सब एक दिन, प्रिय!
सहज, सुंदर, शांत, निश्चल, शून्य हैं
सब एक दिन।
१. पर* पंख पर
भाव: जीवन और दीप का अंत निर्वाण में, शांति में, या परा मिलन में ही होता है। ये आदमी की सारी अथार्टी यहां आ झुक कर नतमस्तक हो सब छोड़ शून्य में विलीन हो जाती है।
जय प्रकाश मिश्र
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