फकीरी! तेरी चाह.. है, तेरे लिए..स्वीकार है ।
भाव: आज समाज में, नव विवाहित जोड़ों के बीच जो अनुसोची घटनाएं घट रही हैं, उन्हें देख दिल दुखता है, हम किसी भी पक्ष के हों। प्रेम और समर्पण की जगह वैर भाव और नृशंस हत्याएं हुई हैं, जो सभ्य समाज पर काला धब्बा हैं। इसी पर कुछ लाइने आप के लिए प्रस्तुत हैं, पढ़ें, आप आनंद लें।
एक दर्द है दिल में मेरे,
जब देखता हूं हाल ये,
खून करता है कोई, जब
सनम का, खुद चाकुओं से।
हाथों की मेहदी छूट पाती
अरे! उससे... भी.. पहले,
रक्त कैसा लाल.. बिखरा
देख तो कपड़ों.. पे उसके।
दर्द.. ही जब नहीं है...
मेरे... लिए,
अब, दिल... में तेरे...
इसके लिए, मैं क्या.. करूंगा!
साथ तेरे उड़.. भी लूंगा,
कुछ समय, इन जंगलों में
बे...सबब, सुनसान से
तूं... ही बता, मैं.. इससे आगे.
क्या.. करूंगा।
पास.. रह तूं, दूर.. जा..
यह तूं समझ!
पर
मैं.. पतिंगा,
तेरी.. शान.. में, अब..
जल.. मरूंगा, तेरी शमा में
अब.. इससे.. आगे, क्या.. करूंगा!
छोड़ सारी बात,
बस एक बात सुन.. तूं !
एक चादर, उम्र की, मैं ओढ.. लूंगा
वो, समय आए उसके पहले*
याद.. तेरी, दिल.. में, रख. के
इससे ज्यादा.. क्या करूंगा।
फकीरी! तेरी चाह.. है
मेरे लिए..,
तेरे..... लिए
सच.. कह.. रहा हूँ
फकीरी.. भी मैं करूंगा,
अल्लाह की हर उजर में
बस तेरा ही नाम लूंगा..
इससे ज्यादा क्या करूंगा।
बस, खुश.. रहे तूं.. हमेशा,
मेरी "चाह.. है"
इसके लिए
मैं,
तूं जो कहे, सब कुछ करूंगा।
आज हमारे बच्चे अपनी सलामती के लिए एक दूसरे से कुछ ऐसी बातें करने लगे हैं। सच युग बदल गया है। प्रेम के टुकड़े हो गए, आशंका ने उसे डंस लिया। संशय उसमें समा गया।
जय प्रकाश मिश्र
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