हे, सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ,
भाव: जीवन क्या है, हम कुछ भी कहें एक नदी सा समय की कठिन चट्टानों के ऊपर बहता, हवाओ पर चढ़ा, ऋतुओं के स्वाद चखता, सौंदर्य, सुख, दुख, पीड़ा, वेदना के धागों में खुद को बुनता, द्वंद के कुहासों में विभ्रमित होता आगे बढ़ता है। इसी में प्रेम, प्यार, राग, अपनत्व के उत्पाद इसे पार्श्व में छूते चलते हैं, उनमें फंसता, टूटता, बिरह पाता, आनंद लेता आगे बढ़ता है। इसी पर कुछ लाइने आप पढ़ें और आनंद लें।
हे, सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ,
पास.. आओ, मिल.. तो लूं!
जरा... ठीक से, गहराइयों में उतरता
हे! अमूर्तनी, हे! अव-व्यया
नीहार.. तो, लूं।
नजदीक.. से
बारीकियां... ले, संजीदगी से
भरे दिल, एक... अक्श तेरा
स्मृति पटल के व्योम पर,
झिलमिलाता,
हीरक कणों सा, उतार तो लूं..!
हे, सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ,
पास.. आओ, मिल.. तो लूं!
चलते.. चलते..., मानस... पटल पे,
चाहता... हूँ,
छवि ये तेरी, विस्तृता..., अव्याहता..
प्रसरा, शरा, चल- चपलिनी, इव कन्दुका
निरंजनी... मन रंजनी
यह.., छाप... तेरी
आदतों में ढाल लूं, उतार.. लूं!
हे, सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ,
पास.. आओ, मिल.. तो लूं!
तुम.. बिजी.. हो, यह.. जानता हूं!
बस.. एक पल, तो.. मांगता हूं
मैं.. जा रहा हूँ,
छोड़.., तेरा देश.. अब..
सच! कह रहा हूं...
नयन मत ऐसे.. चुराओ,
मान जाओ..
हे.., सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ।
पास.. आओ, मिल.. तो लूं!
शिकवा..!
अरे! शिकवा.. किसे?
किस बात का, यह तो बताओ..?
झूठ.. मुझ पर, मत, ..लगाओ,
यह प्रेम है, रे!
रूप.. है, आंचल.. लहरता,
प्रकृति का, तेरा नहीं है,
दाग.. मत, इस, शुभ्र चादर.. पर लगाओ।
मान जाओ..
हे.., सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ।
पास.. आओ, मिल.. तो लूं!
स्मृति.. को कहां.. रख दूं!
जगह.. तो, वह.., तुम.. बताओ..
ना... झरेंगी!
सच! कह.. रहा हूं..
कभी.. भी यह पत्तियां, हरी.. तेरी
पंखुरी..ये, रंगभरी..
किसलय तेरी, ये फुंनगियां.. हल्की गुलाबी
कुनमुनाती स्निग्ध सी..
जुड़ गईं हैं, गहरे.. अंधे.. कूप से
जो सदा रिसता ही रहा, मानव मनों में,
वश.. नहीं इस पर मेरा है..
आंखे धुंधली मत करो, मुझे... माफ कर दो...
मान जाओ..
हे.., सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ।
पास.. आओ, मिल.. तो लूं!
हम तुम, मिले.. थे, क्या.. वो.. दिन थे!
शाम.. थी, लोग बैठे.. रेस्तरां में,
कैसे... गुम.. थे..!
अशनार... थे, वे..हाय कैसे एक दूसरे से..।
देख कर.. क्या उन सभी को
अपने थे, अहसास जागे..
कुछ तो बताओ..
और थोड़ा पास.. आओ,
हल्की सारी लाइटें थी, डिमडिमाती
शाम कैसी सुरमई थी,
आगोश में, ले.. अंधेरों को, पेड़ नीचे
थम गयी थी, लोग बैठे मेज पर
सजाए, अरमान दिल के, जोहते थे
साथ किसकी...
राह, गुपचुप, आंख में काजल लगाए
सब देखती थी।
सुरमई थोड़ा और गाढ़ा
शर्बत-ए -आजम में दुनिया ढल रही थी
गुलाबी उन उंगलियों के बीच से
गुलजार दिल थे, उदास से वे रेस्तरां
दिखते मुझे थे।
हे सुरभि!
उस मोड पर तुम खड़ी थी,
जिंदगी ले, साज़ अपने जिस जगह पर खड़ी थी
इसलिए तो कह रहा हूँ, चली जाना
फिर वहीं, मै जा रहा तुझे छोड़ कर
हे.., सुरभि! थोड़ा.. रुक.. भी जाओ।
पास.. आओ, मिल.. तो लूं!
आखिर में तुमसे।
जय प्रकाश मिश्र
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