छुप रहा सौंदर्य क्यों इन, कुनमुनाते अंग में

भाव: सुंदरता का यदि यथार्थ विश्लेषण किया जाय तो यह, विविध रंगों, तूलिका, और चित्रकार के मन का एक बाह्य प्रदर्शन मात्र ही है। लेकिन विधाता की इन सुंदर कृतियों में इनसे अलग भी बहुत कुछ है जिसमें हम अंततः बंध जाते हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

छुप रहा सौंदर्य क्यों इन, 

कुनमुनाते अंग में 

अंग-रस बन, 

यौवनों.. 

में,

रूप.. में 

पूरी.. तरह , यह 

उतरता.. मुखर होता, क्यों नहीं है? 


जब जब तुम्हें मैं देखता हूं!   

पास से, यथार्थ में

रेखाएं हो तुम, 

रंगीन..

कितनी..., एक संग..

खिंचती हुई, किसी तूलिका की

और तो इससे अलग, सच... कह रहा हूँ, 

इस रूप में, कुछ भी नहीं है।


कुछ भी नहीं है? 

लेकिन ये

क्या 

है..! 

तरल हो तुम, मोम का पुतला कोई..

हो पिघलता, लेकर सरल मन,

आंसुओं में भीगता

पाता तुम्हे हूँ! 

छू.. 

तुम्हे, जब हाथ से 

मैं देखता हूं, ख्वाब हो तुम

दूर से.. 

भ्रम.. हो कोई, 

वास्तविकता कुछ नहीं तुम।


अपने हृदय से पूछता हूँ

मत तिरो, 

सागर में इस, गहरा बहुत है! 

सन्तरण.., 

यह संचरण.. भी मत करो,

झील हैं, आंखे ये गहरी 

जो देखते हो 

मन में तेरे.. जो हंसिनी है, 

स्वामिनी है, 

दृष्टि की ही तो नहीं, इस सृष्टि की

वह बांधती है, मन तेरा, इन उर्मियों से।


जानता हूँ, 

सभी कुछ!  फिर भी क्यूं.. 

लिपटता पंख.. के तेरे... पंक में, मैं..

मैं, पूछता... हूँ

हे! 

वातायनी, 

ये मन मेरा, मेरे ही वश में 

क्यूं नहीं है? 

झूमता, नाचता पग ताल तेरे 

अरे क्यूं? 

यह! इस तरह है।

जय प्रकाश मिश्र


Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!